जगदलपुर 3मार्च2026। छत्तीसगढ़ का बस्तर अंचल अपनी अनोखी परंपराओं और शाही विरासत के लिए देशभर में पहचाना जाता है। यहां होली का आगाज़ साधारण नहीं, बल्कि राजसी ठाठ के साथ होता है। बस्तर की पहली होलिका दहन की परंपरा छोटे से गांव माड़पाल से शुरू होती है, जिसे आज भी ‘राजशाही होली’ के नाम से जाना जाता है।
यह परंपरा 15वीं शताब्दी में बस्तर के शासक राजा पुरुषोत्तम देव के समय से चली आ रही है। इतिहासकारों के अनुसार, वर्ष 1408 में जब राजा पुरुषोत्तम देव जगन्नाथ पुरी से लौट रहे थे, तब माड़पाल गांव में उनका भव्य स्वागत किया गया। ग्रामीणों ने राजा को रथ में विराजमान कर पूरे गांव की परिक्रमा कराई और मां मावली तथा मां दंतेश्वरी की पूजा-अर्चना के बाद विधिवत होलिका दहन किया।
सात पवित्र लकड़ियों से होता है होलिका दहन
माड़पाल में होलिका दहन किसी साधारण अग्नि प्रज्वलन जैसा नहीं होता। यहां सात प्रकार की पवित्र लकड़ियों से चिता सजाई जाती है, जिनका धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व विशेष माना जाता है। पहले देवी की पूजा, फिर रथारोहण और उसके बाद होलिका दहन—यह पूरी प्रक्रिया शाही अनुष्ठान की तरह संपन्न होती है।
आस्था और राजसी वैभव का संगम
माड़पाल की यह परंपरा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि बस्तर की सांस्कृतिक पहचान का जीवंत प्रतीक है। यहां हर साल हजारों श्रद्धालु और पर्यटक पहुंचते हैं, जो बस्तर की पहली होली के साक्षी बनते हैं। रथ, राजसी विधि-विधान और सामूहिक सहभागिता इस उत्सव को और भी खास बना देते हैं।
बस्तर की होली में आस्था, इतिहास और शाही परंपरा का अद्भुत संगम देखने को मिलता है—जहां राजा की याद, देवी की पूजा और लोक संस्कृति की झलक एक साथ दिखाई देती है।
600 साल पुरानी ‘राजशाही होली’: माड़पाल से शुरू होती है बस्तर की पहली होलिका दहन परंपरा