21अप्रैल 2026
जगदलपुर /बस्तर के घने जंगलों में कभी संघर्ष और असुरक्षा के बीच जीवन बिताने वाले माओवादी अब मुख्यधारा में लौटकर नई शुरुआत कर रहे हैं। संगठन के दौरान जहां शादी की अनुमति थी, वहीं संतान पैदा करने पर रोक थी। लेकिन अब पुनर्वास के बाद इन पूर्व माओवादियों के लिए परिवार बसाने का रास्ता खुल रहा है।
सरकारी पहल के तहत रिवर्स नसबंदी की प्रक्रिया अपनाई जा रही है, जिससे अब तक 56 पूर्व माओवादियों की नसबंदी खुलवाई जा चुकी है। इनमें से 27 लोग संतान सुख प्राप्त कर चुके हैं और सामान्य जीवन जी रहे हैं। वहीं, कई अन्य भी इस प्रक्रिया के लिए आगे आ रहे हैं।
बस्तर रेंज के आईजी सुंदरराज पी के मुताबिक, माओवादी संगठन में बच्चों को बोझ माना जाता था। कठिन भौगोलिक परिस्थितियों और लगातार हिंसक गतिविधियों के कारण संगठन में पुरुष सदस्यों की नसबंदी कराई जाती थी, ताकि वे पूरी तरह सक्रिय रह सकें। अब आत्मसमर्पण के बाद इन्हीं लोगों को सामान्य जीवन देने के लिए रिवर्स ऑपरेशन कराया जा रहा है।
पुनर्वासित माओवादियों की भावनाएं भी इस बदलाव को दर्शाती हैं। एक पूर्व माओवादी ने बताया कि दूसरों के बच्चों को देखकर उन्हें अपने जीवन की कमी महसूस होती थी। उन्होंने पुलिस से नसबंदी खुलवाने की मांग की, जिसके बाद ऑपरेशन सफल हुआ और अब वे अपने बच्चों के साथ नई जिंदगी जी रहे हैं।
हाल ही में आत्मसमर्पण करने वाले डीवीसीएम स्तर के माओवादी सोमडु पोड़ियाम ने भी रिवर्स नसबंदी की इच्छा जताई है, ताकि वे भी परिवार के साथ सामान्य जीवन जी सकें।
वहीं, संगठन में लंबे समय तक सक्रिय रहे माओवादी डॉक्टर सुखलाल जुर्री ने खुलासा किया कि संगठन में केवल पुरुष माओवादियों की नसबंदी कराई जाती थी। यह प्रक्रिया सीमित समय तक चली, जिसमें कुछ सदस्यों पर यह लागू किया गया।
बस्तर में यह बदलाव सिर्फ नीतियों का नहीं, बल्कि सोच का भी संकेत है—जहां कभी बंदूक की गूंज थी, वहां अब बच्चों की किलकारियां सुनाई देने लगी हैं।