पारिवारिक मामलों में इलेक्ट्रॉनिक सबूतों पर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: 65-बी सर्टिफिकेट न होने पर भी सीसीटीवी फुटेज खारिज नहीं होगी

बिलासपुर, 26 जनवरी 2026।
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने पारिवारिक विवादों से जुड़े मामलों में इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों को लेकर एक महत्वपूर्ण और दूरगामी प्रभाव वाला फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि फैमिली कोर्ट में लंबित मामलों के निपटारे के दौरान सीसीटीवी फुटेज, सीडी, वीडियो या अन्य इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड को केवल इस आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता कि उनके साथ भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 65-बी का प्रमाणपत्र संलग्न नहीं है।
जस्टिस संजय के. अग्रवाल और जस्टिस अरविंद कुमार वर्मा की डिवीजन बेंच ने महासमुंद फैमिली कोर्ट के दो आदेशों को निरस्त करते हुए मामले को पुनः सुनवाई के लिए फैमिली कोर्ट को वापस भेज दिया है। यह आदेश पति की ओर से दायर अपील पर पारित किया गया।

क्या है पूरा मामला


मामला रायगढ़ निवासी एक दंपती से जुड़ा है, जिनके बीच लंबे समय से वैवाहिक विवाद चल रहा है। पति ने फैमिली कोर्ट में पत्नी के खिलाफ क्रूरता और आपत्तिजनक आचरण के आरोप लगाते हुए तलाक की याचिका दायर की थी। वहीं, पत्नी ने दांपत्य अधिकारों की बहाली के लिए अलग से आवेदन प्रस्तुत किया था।
पति का आरोप था कि उसकी पत्नी के अन्य पुरुषों के साथ अनैतिक संबंध हैं और वह उनसे अश्लील चैटिंग एवं न्यूड वीडियो कॉल करती है। इन आरोपों को प्रमाणित करने के लिए पति ने कथित रूप से बेडरूम में बिना जानकारी के सीसीटीवी कैमरा लगाया और उससे प्राप्त वीडियो फुटेज को एक सीडी में सुरक्षित कर फैमिली कोर्ट में साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत किया।

फैमिली कोर्ट ने क्यों किया साक्ष्य खारिज


महासमुंद फैमिली कोर्ट ने पति की तलाक याचिका को खारिज करते हुए कहा था कि प्रस्तुत सीसीटीवी फुटेज वाली सीडी के साथ भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 65-बी के तहत अनिवार्य प्रमाणपत्र संलग्न नहीं है, इसलिए उसे साक्ष्य के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता। इसके साथ ही कोर्ट ने पत्नी की दांपत्य अधिकारों की बहाली की याचिका स्वीकार कर ली थी।

हाईकोर्ट का अहम हस्तक्षेप


फैमिली कोर्ट के इस आदेश को पति ने हाईकोर्ट में चुनौती दी। मामले की सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के दोनों आदेशों को रद्द कर दिया। डिवीजन बेंच ने कहा कि फैमिली कोर्ट अधिनियम, 1984 की धारा 14 और 20 के तहत फैमिली कोर्ट को व्यापक अधिकार प्राप्त हैं।
इन धाराओं के अनुसार, फैमिली कोर्ट न्यायसंगत और प्रभावी निर्णय के लिए किसी भी दस्तावेज या साक्ष्य को स्वीकार कर सकती है, भले ही वह साक्ष्य अधिनियम की तकनीकी औपचारिकताओं पर पूरी तरह खरा न उतरता हो।
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों को केवल तकनीकी कमियों के आधार पर पूरी तरह खारिज करना उचित नहीं है, विशेषकर तब जब वे विवाद के मूल प्रश्नों को स्पष्ट करने में सहायक हो सकते हों।

दोबारा सुनवाई के निर्देश


हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट को निर्देश दिया है कि वह सीसीटीवी फुटेज वाली सीडी को रिकॉर्ड पर ले, उस पर जिरह की अनुमति दे और तलाक एवं दांपत्य अधिकारों की बहाली से जुड़े दोनों मामलों की नए सिरे से सुनवाई करे।
कोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि मामला चार वर्षों से अधिक समय से लंबित है, इसलिए फैमिली कोर्ट इसे प्राथमिकता के आधार पर सुनते हुए इस पर शीघ्र निर्णय दे।

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