कोंडागांव/बस्तर14सितंबर 2026/छत्तीसगढ़ के बस्तर अंचल में भादो जात्रा के दौरान लगने वाली भंगाराम माई की देव अदालत एक बार फिर चर्चा में है। यहां इंसानों से जुड़े विवादों के बजाय देवी-देवताओं और स्थानीय देव शक्तियों से संबंधित मामलों पर पारंपरिक तरीके से सुनवाई की गई। इस दौरान कुल 157 मामलों पर विचार हुआ।
लोक आस्था से जुड़ी इस अनोखी परंपरा में कुछ देवी-देवताओं पर गांव में बीमारी फैलने, फसल प्रभावित होने या अनहोनी जैसी घटनाओं के लिए जिम्मेदार होने के आरोप लगाए गए। पुजारियों और पारंपरिक व्यवस्था के माध्यम से मामलों की सुनवाई के बाद 35 देवी-देवताओं को ‘उम्रकैद’ का फैसला सुनाया गया। यहां उम्रकैद का मतलब जेल भेजना नहीं, बल्कि संबंधित देव शक्ति की पूजा, स्थापना और सामाजिक मान्यता पर स्थायी रोक माना जाता है।
कुछ मामलों में एक साल की ‘रिमांड’
देव अदालत की सबसे खास परंपराओं में रिमांड की व्यवस्था भी शामिल है। जिन मामलों में तत्काल अंतिम निर्णय नहीं लिया जाता, उनमें संबंधित देव शक्तियों को एक वर्ष की रिमांड पर रखा जाता है। इस अवधि में उनके प्रभाव और संबंधित गांव की परिस्थितियों को देखा जाता है। अगले साल भादो जात्रा के दौरान ऐसे मामलों पर दोबारा विचार कर अंतिम निर्णय लिया जाता है।
सदियों पुरानी आस्था का हिस्सा
यह परंपरा कोंडागांव जिले के नौ परगना क्षेत्र के ग्रामीणों की धार्मिक और सांस्कृतिक मान्यताओं से जुड़ी हुई है। बड़ी संख्या में ग्रामीण और श्रद्धालु इस अनोखी प्रक्रिया को देखने पहुंचते हैं। यहां आधुनिक अदालत की तरह जज, वकील या कानूनी धाराएं नहीं होतीं, बल्कि पुजारी, पारंपरिक रीति-रिवाज और लोक आस्था के आधार पर निर्णय की प्रक्रिया आगे बढ़ती है।
भंगाराम माई की यह देव अदालत बस्तर की समृद्ध आदिवासी सांस्कृतिक परंपराओं और पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था की एक अनूठी मिसाल के तौर पर देखी जाती है।