दंतेवाड़ा 12सितम्बर 2026/कभी जिन परिस्थितियों में पढ़ाई करना भी चुनौती माना जाता था, वहीं से निकलकर नम्रता जैन ने देश की सबसे कठिन प्रतियोगी परीक्षाओं में अपनी पहचान बनाई। दंतेवाड़ा जिले के गीदम की रहने वाली नम्रता आज भारतीय प्रशासनिक सेवा की अधिकारी हैं। उनकी सफलता की कहानी बस्तर के उन युवाओं के लिए खास प्रेरणा है, जो सीमित संसाधनों के बावजूद बड़े सपने देखते हैं।
नम्रता की स्कूली शिक्षा कारली स्थित निर्मल निकेतन स्कूल से हुई। स्कूल घर से काफी दूर था और उन्हें पढ़ाई के लिए रोजाना करीब 8 किलोमीटर का सफर करना पड़ता था। क्षेत्र में कई बार पैदा होने वाली अस्थिर परिस्थितियों का असर पढ़ाई पर भी पड़ता था, लेकिन उन्होंने अपनी शिक्षा जारी रखी।
इंजीनियरिंग के बाद सिविल सेवा की तैयारी
10वीं की पढ़ाई पूरी करने के बाद नम्रता ने आगे की शिक्षा के लिए दुर्ग का रुख किया। इसके बाद उन्होंने भिलाई इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से इलेक्ट्रॉनिक्स एंड टेलीकम्युनिकेशन में इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल की।
इंजीनियरिंग के बाद उन्होंने सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी शुरू की। दूसरे प्रयास में उन्हें 99वीं रैंक मिली और उनका चयन IPS के लिए हो गया। हालांकि नम्रता इससे संतुष्ट नहीं हुईं। उनका लक्ष्य प्रशासनिक सेवा में जाने का था।
IPS की ट्रेनिंग के बीच भी जारी रखी तैयारी
IPS की ट्रेनिंग के दौरान भी नम्रता ने UPSC की तैयारी नहीं छोड़ी। मेहनत और लगातार प्रयास का परिणाम उन्हें 2018 में मिला। तीसरे प्रयास में उन्होंने UPSC में ऑल इंडिया 12वीं रैंक हासिल की और IAS बनने का सपना पूरा किया।
अब उसी क्षेत्र के विकास पर दे रहीं जोर
IAS बनने के बाद नम्रता ने उन इलाकों पर भी ध्यान दिया, जहां से उनके अपने संघर्ष की शुरुआत हुई थी। दूरस्थ क्षेत्रों में शिक्षा की सुविधाएं बढ़ाने के साथ स्कूल, आंगनवाड़ी और स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने पर काम किया गया। उनके कार्यकाल में सुदूर इलाकों में 24 नए स्कूल शुरू किए जाने की जानकारी सामने आई है।
कुछ समय पहले उनका एक वीडियो भी चर्चा में आया था, जिसमें वह बाइक से दंतेवाड़ा के ग्रामीण और संवेदनशील इलाके में पहुंचकर वहां की स्थिति का जायजा लेती नजर आई थीं। यह तस्वीर इसलिए भी खास रही क्योंकि वह खुद इसी क्षेत्र की परिस्थितियों से निकलकर आगे बढ़ी हैं।
नम्रता जैन की यात्रा यह दिखाती है कि कठिन भौगोलिक परिस्थितियां और सीमित सुविधाएं प्रतिभा के रास्ते की अंतिम बाधा नहीं होतीं। सही लक्ष्य, लगातार मेहनत और उसे हासिल करने की जिद हो तो बस्तर जैसे दूरस्थ इलाके से भी देश की सर्वोच्च प्रशासनिक सेवाओं तक पहुंचा जा सकता है।