छत्तीसगढ़ में अदालतों में दस्तावेज पेश करने के नियम बदले, अब दोनों पक्षों की सहमति जरूरी

मुकदमे की शुरुआत में ही तय होगा दस्तावेज असली है या नहीं, विवादित दस्तावेजों पर ही होगी विस्तृत सुनवाई

बिलासपुर 10सितम्बर 2026/छत्तीसगढ़ में अदालतों में पेश किए जाने वाले दस्तावेजों की प्रामाणिकता को लेकर अब मुकदमे के शुरुआती चरण में ही स्थिति स्पष्ट करनी होगी। राज्य सरकार ने ‘छत्तीसगढ़ दस्तावेजों की स्वीकारोक्ति अथवा इंकार नियम, 2026’ अधिसूचित कर दिए हैं। ये नियम भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 330 के तहत लागू किए गए हैं।

दस्तावेज पेश करते समय देनी होगी पूरी जानकारी

नए नियमों के तहत आपराधिक मामले में अभियोजन पक्ष या आरोपी जब किसी दस्तावेज को साक्ष्य के रूप में पेश करेगा, तो उसे निर्धारित प्रारूप में आवेदन के साथ दस्तावेजों की सूची भी प्रस्तुत करनी होगी। इसके बाद विरोधी पक्ष को प्रत्येक दस्तावेज की प्रामाणिकता स्वीकार करने या उससे इंकार करने का अवसर दिया जाएगा।

सूची में दर्ज होगी ये महत्वपूर्ण जानकारी

दस्तावेजों की सूची में दस्तावेज का नाम और पूरा विवरण, जारी होने की तारीख, दस्तावेज मूल है या प्रतिलिपि, तथा उसे जारी या सत्यापित करने वाले प्राधिकारी का नाम दर्ज करना होगा। इसके साथ ही यह भी स्पष्ट करना होगा कि विरोधी पक्ष दस्तावेज की प्रामाणिकता स्वीकार करता है या इंकार

सूची पर आवेदन प्रस्तुत करने वाले पक्ष के साथ-साथ विरोधी पक्ष के हस्ताक्षर भी होंगे।

सहमति वाले दस्तावेजों को अलग से साबित करने की जरूरत नहीं

नए प्रावधान का सबसे बड़ा असर यह होगा कि जिन दस्तावेजों की प्रामाणिकता पर विरोधी पक्ष कोई आपत्ति नहीं करेगा, उन्हें अलग से प्रमाणित कराने की आवश्यकता नहीं होगी। ऐसे दस्तावेजों को अदालत साक्ष्य के रूप में रिकॉर्ड पर ले सकेगी।

वहीं, जिन दस्तावेजों की प्रामाणिकता को चुनौती दी जाएगी, केवल उन्हीं पर विस्तृत सुनवाई और प्रमाण की प्रक्रिया अपनाई जाएगी।

अदालत का समय बचाने की कोशिश

अब तक कई मामलों में दस्तावेजों की प्रामाणिकता को लेकर विवाद सुनवाई के दौरान सामने आता था। इसके चलते दस्तावेजों को साबित करने के लिए अतिरिक्त गवाह और अन्य साक्ष्य पेश करने पड़ते थे। नए नियमों से यह स्पष्ट हो सकेगा कि मुकदमे की शुरुआत में ही कौन से दस्तावेज निर्विवाद हैं और किन दस्तावेजों पर वास्तविक विवाद है।

इससे अदालत का समय अनावश्यक दस्तावेजी विवादों में खर्च होने से बच सकता है और साक्ष्य दर्ज करने की प्रक्रिया अधिक व्यवस्थित हो सकती है। हालांकि, अधिसूचना में मामलों के निपटारे की अवधि कम होने का कोई प्रत्यक्ष दावा नहीं किया गया है।

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