रांची 2सितम्बर 2026/खेल के मैदान पर देश का नाम रोशन करने के बाद भी अगर किसी खिलाड़ी को परिवार का पेट पालने के लिए सड़क किनारे सब्जियां बेचनी पड़ें और रात में कैब चलानी पड़े, तो यह सिर्फ एक खिलाड़ी की मजबूरी नहीं, बल्कि खेल प्रतिभाओं को मिलने वाली सरकारी सहायता पर भी बड़ा सवाल खड़ा करता है। झारखंड के 29 वर्षीय थ्रोबॉल खिलाड़ी अमरदीप की कहानी कुछ ऐसी ही है।
अमरदीप ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का प्रतिनिधित्व करते हुए चार स्वर्ण पदक अपने नाम किए हैं। इसके बावजूद आज उनकी जिंदगी आर्थिक संघर्ष से गुजर रही है। रांची के अरगोड़ा चौक पर वह अपने परिवार की मदद के लिए सब्जियां बेचते हैं और जरूरत पड़ने पर रात में कैब भी चलाते हैं। उनका कहना है कि वर्षों से सरकारी नौकरी और प्रोत्साहन राशि के लिए आवेदन करने के बावजूद उन्हें अब तक कोई ठोस मदद नहीं मिल सकी है।
चार अंतरराष्ट्रीय गोल्ड, लेकिन जिंदगी में संघर्ष बरकरार
अमरदीप ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपने प्रदर्शन की शुरुआत कम उम्र में ही कर दी थी। उन्होंने 2015 में मलेशिया में आयोजित एशियन जूनियर थ्रोबॉल चैंपियनशिप में भारत के लिए स्वर्ण पदक जीता।
इसके बाद उनकी उपलब्धियों का सिलसिला जारी रहा। वर्ष 2017 में काठमांडू में इंडो-नेपाल थ्रोबॉल चैंपियनशिप में भी उन्होंने गोल्ड मेडल हासिल किया। इसके बाद 2019 में बेंगलुरु में आयोजित साउथ एशियन थ्रोबॉल चैंपियनशिप में उन्होंने फिर देश के लिए स्वर्ण पदक जीता।
अमरदीप की चौथी बड़ी उपलब्धि वर्ष 2026 में रांची में आयोजित साउथ एशियन थ्रोबॉल चैंपियनशिप के दूसरे संस्करण में आई, जहां उन्होंने एक बार फिर गोल्ड मेडल अपने नाम किया।
चार अंतरराष्ट्रीय स्वर्ण पदक जीतने के बाद उम्मीद थी कि उनकी उपलब्धियां उनके भविष्य को सुरक्षित करेंगी। लेकिन आज भी उन्हें स्थायी रोजगार और सरकारी प्रोत्साहन का इंतजार है।
2016 से सरकारी मदद की उम्मीद
अमरदीप के मुताबिक, उन्होंने सरकारी प्रोत्साहन राशि के लिए वर्ष 2016 से प्रयास शुरू किए थे। इसके बाद उन्होंने सरकारी नौकरी के लिए भी आवेदन और संपर्क करना शुरू किया। वर्ष 2020 में उन्होंने नौकरी के लिए प्रयास तेज किए, लेकिन इसी दौरान कोरोना महामारी के कारण परिस्थितियां बदल गईं।
महामारी के बाद वर्ष 2022 से उन्होंने एक बार फिर नौकरी के लिए सरकारी स्तर पर लगातार प्रयास किए। उनका दावा है कि कई बार संबंधित अधिकारियों और जिम्मेदार लोगों से संपर्क करने के बावजूद उनकी समस्या का समाधान नहीं हो सका।
अमरदीप यह भी बताते हैं कि उन्होंने अपनी समस्या को सरकार तक पहुंचाने की कोशिश की और पूर्व खेल मंत्री हफीजुल हसन से भी मुलाकात की। हालांकि, इसके बाद भी उन्हें सरकारी नौकरी मिलने की उम्मीद पूरी नहीं हुई।
दूसरे राज्यों के खिलाड़ियों को देखकर उठता है सवाल
अमरदीप का कहना है कि उनके कई साथी खिलाड़ी दूसरे राज्यों से आते हैं और अंतरराष्ट्रीय उपलब्धियां हासिल करने के बाद उन्हें सरकारी नौकरी तथा अन्य सुविधाएं मिली हैं।
वह विशेष रूप से हरियाणा, बिहार और छत्तीसगढ़ के खिलाड़ियों का उदाहरण देते हैं। उनका सवाल है कि जब दूसरे राज्यों में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश और राज्य का प्रतिनिधित्व करने वाले खिलाड़ियों के लिए नौकरी और सम्मान की व्यवस्था हो सकती है, तो झारखंड में ऐसी व्यवस्था का लाभ खिलाड़ियों को क्यों नहीं मिल रहा?
उनका मानना है कि खिलाड़ियों को केवल पदक जीतने के समय याद करने के बजाय उनके करियर और भविष्य को सुरक्षित करने के लिए भी ठोस व्यवस्था होनी चाहिए।
घर की आर्थिक स्थिति भी मुश्किल
अमरदीप की पारिवारिक परिस्थितियां भी आसान नहीं हैं। उनके पिता सब्जी बेचने का काम करते हैं और अमरदीप भी परिवार की आमदनी बढ़ाने के लिए उनके साथ सब्जियां बेचते हैं।
उनकी मां गृहिणी हैं, लेकिन परिवार की आर्थिक जरूरतों को पूरा करने के लिए वह भी घर-घर जाकर सब्जियां बेचती हैं। बताया जाता है कि वह करीब 35 किलो तक सब्जियां सिर पर रखकर ग्राहकों तक पहुंचाती हैं।
अमरदीप के बड़े भाई भी परिवार की मदद के लिए फास्ट फूड का छोटा कारोबार करते हैं। ऐसे में पूरे परिवार की आमदनी अलग-अलग छोटे कामों से मिलकर चलती है।
अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट खेलने के लिए लेना पड़ा कर्ज
अमरदीप के लिए अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी बनने का सफर भी आसान नहीं था। आर्थिक दिक्कतों के बावजूद उन्होंने खेल को नहीं छोड़ा। कई मौकों पर प्रतियोगिताओं में भाग लेने के लिए उन्हें कर्ज तक लेना पड़ा।
हालांकि इस सफर में झारखंड थ्रोबॉल एसोसिएशन की ओर से भी उन्हें सहयोग मिला। एसोसिएशन की मदद से उन्होंने कई प्रतियोगिताओं में हिस्सा लिया और अपने खेल करियर को आगे बढ़ाया।
लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहुंचने के बाद भी आर्थिक स्थिरता नहीं मिल पाना उनके लिए बड़ी चुनौती बन गया है।
रात में कैब चलाकर परिवार चलाते हैं, सुबह मैदान में पसीना बहाते हैं
अमरदीप की दिनचर्या किसी संघर्ष की कहानी से कम नहीं है। परिवार की आर्थिक जरूरतों को पूरा करने के लिए कई बार उन्हें रात में कैब चलानी पड़ती है।
देर रात तक कैब चलाने के बाद सुबह मैदान में अभ्यास करना उनके लिए शारीरिक और मानसिक रूप से बेहद चुनौतीपूर्ण होता है। थकान के बावजूद वह अपने खेल को जारी रखने की कोशिश करते हैं।
उनके सामने एक तरफ परिवार की जिम्मेदारियां हैं तो दूसरी तरफ अपने खेल करियर को बचाए रखने की चुनौती। इसके बावजूद अमरदीप ने अभी खेल छोड़ने का फैसला नहीं किया है।
चार गोल्ड के बाद भी सपना बाकी
आर्थिक परेशानियों और सरकारी नौकरी के इंतजार के बावजूद अमरदीप की उम्मीद खत्म नहीं हुई है। वह अब भी मैदान पर वापसी करना चाहते हैं और देश के लिए आगे भी खेलना चाहते हैं।
उनकी योजना अक्टूबर 2026 के अंत में श्रीलंका में होने वाले एक टूर्नामेंट में हिस्सा लेने की है। इसके लिए वह अपनी परिस्थितियों के बीच अभ्यास जारी रखे हुए हैं।
अमरदीप की कहानी यह सोचने पर मजबूर करती है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश के लिए पदक जीतने वाले खिलाड़ियों के लिए सम्मान केवल मेडल और प्रमाणपत्र तक सीमित रहना चाहिए या उनके भविष्य को सुरक्षित करने की भी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।
रांची की सड़कों पर सब्जी बेचने और रात में कैब चलाने वाला यह खिलाड़ी आज भी उसी उम्मीद के साथ मैदान में उतरना चाहता है—कि एक दिन उसकी मेहनत और उपलब्धियों को वह सम्मान और सहारा मिलेगा, जिसका वह वर्षों से इंतजार कर रहा है।