बलिया की मासूम बच्ची का हौसला देख हर कोई हैरान, छह महीने की उम्र में हादसे ने छीन लिया था एक पैर; आर्थिक तंगी के बावजूद स्कूल जाने की जिद
बलिया 2सितंबर 2026/स्कूल जाने के लिए बच्चे सुबह बैग उठाते हैं और दोस्तों के साथ हंसते-खेलते निकल पड़ते हैं। लेकिन बलिया की सात साल की रागिनी के लिए स्कूल तक पहुंचना किसी चुनौती से कम नहीं है। उसके पास सिर्फ एक पैर है, फिर भी पढ़ने की चाहत इतनी मजबूत है कि वह रोजाना अपने घर से करीब 400 मीटर दूर प्राथमिक विद्यालय तक पहुंचने की कोशिश करती है। रास्ते में थककर कई बार बैठती है, कभी आंसू निकल आते हैं, लेकिन पढ़ाई का सपना छोड़ने को तैयार नहीं है।
छह महीने की उम्र में बदल गई जिंदगी
रागिनी मनियर क्षेत्र के रानीपुर गांव की रहने वाली है। उसकी मां बबीता देवी के अनुसार, जब रागिनी महज छह महीने की थी, तब उसे गोद में लेकर दवा लेने जाते समय रास्ते में हादसा हो गया। हादसे में उसके एक पैर को गंभीर चोट लगी।
परिवार ने बच्ची का इलाज कराने की पूरी कोशिश की। कई जगह उपचार कराया गया, लेकिन पैर को बचाया नहीं जा सका। परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण आगे का इलाज कराना भी मुश्किल हो गया।
सामने से बच्चे स्कूल जाते हैं तो रोने लगती है रागिनी
रागिनी अब प्राथमिक विद्यालय दिघेड़ा में कक्षा एक की छात्रा है। स्कूल उसके घर से महज 400 मीटर की दूरी पर है, लेकिन उसके लिए यही दूरी बेहद मुश्किल बन जाती है।
जब आसपास के बच्चे स्कूल की ड्रेस पहनकर बैग लेकर उसके सामने से गुजरते हैं, तो रागिनी भी उनके साथ स्कूल जाने की जिद करती है। परिवार के लोग जब उसे छोड़ पाते हैं तो वह स्कूल पहुंच जाती है, लेकिन कई बार उसे खुद ही एक पैर के सहारे रास्ता तय करना पड़ता है।
रास्ते में थककर बैठ जाती है, लेकिन वापस नहीं लौटती
स्कूल जाने के दौरान रागिनी को कई बार जमीन पर बैठकर आराम करना पड़ता है। शारीरिक परेशानी और दर्द के कारण उसकी आंखों से आंसू भी निकल आते हैं। मां के मुताबिक, बेटी को इस हालत में देखकर उनका कलेजा कांप उठता है।
इसके बावजूद रागिनी की पढ़ाई के प्रति लगन कम नहीं हुई है। वह मुश्किल रास्ते को पार करके स्कूल पहुंचना चाहती है, क्योंकि उसके मन में भी दूसरे बच्चों की तरह पढ़ने और आगे बढ़ने का सपना है।
परिवार की आर्थिक हालत कमजोर
रागिनी के पिता मजदूरी करते हैं और परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत मजबूत नहीं है। ऐसे में बच्ची के लिए कृत्रिम पैर या दूसरे जरूरी उपकरण की व्यवस्था करना परिवार के लिए बड़ी चुनौती है।
परिवार चाहता है कि रागिनी को ऐसा सहारा मिले जिससे वह आसानी से स्कूल जा सके और रोजाना के काम भी आत्मनिर्भर होकर कर सके। उसके लिए कृत्रिम पैर के साथ-साथ स्कूल आने-जाने में मदद करने वाला कोई उपयुक्त साधन मिल जाए तो उसकी मुश्किल काफी कम हो सकती है।
स्कूल प्रशासन ने भी मदद की जरूरत बताई
प्राथमिक विद्यालय दिघेड़ा के प्रभारी प्रधानाध्यापक अजीत पाल यादव ने बताया कि रागिनी कक्षा एक में पढ़ती है और उसे स्कूल आने-जाने में काफी परेशानी होती है। उन्होंने कहा कि बच्ची को सरकारी सहायता मिलनी चाहिए।
प्रधानाध्यापक के मुताबिक, एक सरकारी योजना के तहत सहायता का मौका आया था, लेकिन रागिनी का दाखिला देर से होने के कारण उस समय उसे लाभ नहीं मिल पाया। अब उसका पंजीकरण करा दिया गया है। योजना दोबारा आने पर उसे लाभ दिलाने का प्रयास किया जाएगा।
रागिनी की कहानी समाज से एक सवाल भी पूछती है
रागिनी के सामने मुश्किलें बहुत हैं, लेकिन उसके हौसले में कोई कमी नहीं है। एक पैर के सहारे 400 मीटर का सफर तय करके स्कूल पहुंचने की उसकी कोशिश बताती है कि पढ़ने की इच्छा किसी शारीरिक कमी से बड़ी हो सकती है।
अब जरूरत इस बात की है कि रागिनी को सिर्फ हौसले की तारीफ नहीं, बल्कि एक ऐसा सहारा मिले जिससे स्कूल तक उसका सफर आसान हो और उसके सपनों की राह में शारीरिक मजबूरी बाधा न बने।