न खाना, न सुरक्षित जमीन… फिर भी 5 दिन जिंदा रहा शख्स, जानिए शरीर का सर्वाइवल साइंस”

भद्रक | 24 अगस्त 2026: ओडिशा के भद्रक जिले के बलिपाटना गांव में बाढ़ के बीच 35 वर्षीय सुनंदा बेहरा के पांच दिनों तक एक ताड़ के पेड़ से चिपके रहकर जिंदा बचने की घटना ने हर किसी को हैरान कर दिया है। तेज बहाव में बहने के बाद सुनंदा लापता थे। पांच दिन बाद कुछ ग्रामीणों ने उन्हें पेड़ से लिपटा देखा और इसकी सूचना ओडिशा डिजास्टर रैपिड एक्शन फोर्स (ODRAF) को दी। रेस्क्यू के बाद उन्हें तत्काल अस्पताल पहुंचाया गया।
संकट में शरीर कैसे बचाता है जान?
ऐसी परिस्थितियों में सिर्फ इच्छाशक्ति ही नहीं, बल्कि शरीर की बेहद जटिल सर्वाइवल बायोलॉजी भी काम करती है। खतरा महसूस होते ही मस्तिष्क शरीर को ‘फाइट या फ्लाइट’ मोड में डाल देता है। एड्रेनालिन और कोर्टिसोल जैसे हार्मोन सतर्कता बढ़ाते हैं और शरीर को तत्काल खतरे से निपटने के लिए तैयार करते हैं।
भोजन न मिले तो बदल जाता है ऊर्जा का तरीका
लंबे समय तक भोजन न मिलने पर शरीर पहले ग्लाइकोजन का इस्तेमाल करता है। इसके बाद ऊर्जा के लिए मुख्य रूप से जमा वसा का उपयोग बढ़ जाता है और लीवर कीटोन बनाता है। इससे शरीर और मस्तिष्क को कुछ समय तक ऊर्जा मिलती रहती है। हालांकि लंबे समय तक भूखे रहने पर मांसपेशियों का क्षय और गंभीर कमजोरी भी हो सकती है।
पानी की कमी से निपटने की कोशिश करता है शरीर
डिहाइड्रेशन की स्थिति में शरीर एंटी-ड्यूरेटिक हार्मोन (ADH) के जरिए गुर्दों में पानी के पुनः अवशोषण को बढ़ाता है। इससे पेशाब कम बनता है और शरीर उपलब्ध पानी को अधिक समय तक बचाने की कोशिश करता है। लेकिन बाढ़ के पानी के आसपास मौजूद होना पीने योग्य पानी उपलब्ध होने के बराबर नहीं है—गंदा पानी पीना संक्रमण और अन्य गंभीर समस्याएं पैदा कर सकता है।
दर्द और थकान के बीच दिमाग की भूमिका
अत्यधिक तनाव और दर्द के दौरान शरीर एंडोर्फिन जैसे रसायन छोड़ सकता है, जो दर्द की अनुभूति को कुछ हद तक कम करते हैं। साथ ही लक्ष्य पर ध्यान बनाए रखना और बचने की उम्मीद व्यक्ति को कठिन परिस्थितियों में सक्रिय रहने में मदद कर सकती है। हालांकि इसे केवल ‘मजबूत इच्छाशक्ति’ से समझना वैज्ञानिक रूप से सही नहीं होगा।
दुनिया में पहले भी सामने आए हैं ऐसे मामले
इतिहास में कई लोगों ने बेहद कठिन परिस्थितियों में जीवित रहने के असाधारण उदाहरण पेश किए हैं। 2003 में अमेरिकी पर्वतारोही एरॉन राल्स्टन चट्टान में फंसने के बाद अपनी जान बचाने के लिए गंभीर कदम उठाने को मजबूर हुए। 1971 में विमान हादसे के बाद जूलियान कोप्के अमेजन के जंगल में 11 दिन तक जीवित रहीं।
ओडिशा के सुनंदा बेहरा की घटना भी यही बताती है कि चरम परिस्थितियों में इंसानी शरीर और दिमाग कई स्तरों पर खुद को बचाने की कोशिश करते हैं। इच्छाशक्ति महत्वपूर्ण हो सकती है, लेकिन उसके पीछे शरीर की हार्मोनल, चयापचयी और न्यूरोलॉजिकल प्रक्रियाएं भी उतनी ही अहम भूमिका निभाती हैं।

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