‘वनवासी’ शब्द पर बवाल: सूरजपुर में आदिवासी समाज का उग्र प्रदर्शन, पुतला दहन कर राष्ट्रपति के नाम सौंपा ज्ञापन

3जून2026

सूरजपुर। केंद्रीय गृह मंत्री द्वारा आदिवासी समुदाय के लिए “वनवासी” शब्द के इस्तेमाल को लेकर सूरजपुर में आदिवासी एवं मूलवासी समाज का आक्रोश खुलकर सामने आया। बुधवार को जिला मुख्यालय स्थित अग्रसेन चौक (पुराना बस स्टैंड) में बड़ी संख्या में समाज के लोग एकत्रित हुए और विरोध प्रदर्शन करते हुए गृह मंत्री का पुतला दहन किया। प्रदर्शन के दौरान सभा आयोजित कर वक्ताओं ने इसे आदिवासी समाज की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान पर आघात बताया।

विशेष बात यह रही कि तेज धूप और बीच-बीच में हुई बारिश भी प्रदर्शनकारियों के हौसले को डिगा नहीं सकी। मौसम की प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद लोग डटे रहे और नारेबाजी के माध्यम से अपना विरोध दर्ज कराते रहे। प्रदर्शन स्थल पर बड़ी संख्या में युवाओं, महिलाओं और समाज के वरिष्ठ लोगों की मौजूदगी ने आंदोलन को व्यापक स्वरूप दिया।

विरोध प्रदर्शन के दौरान समाज के वक्ताओं ने कहा कि आदिवासी समुदाय केवल जंगलों में रहने वाले लोगों का समूह नहीं है, बल्कि भारत की प्राचीनतम सभ्यताओं में से एक का प्रतिनिधित्व करता है। उनकी अपनी विशिष्ट भाषा, संस्कृति, परंपराएं, सामाजिक संरचना और जीवन-दर्शन है। ऐसे में “वनवासी” जैसे शब्दों का प्रयोग उनकी वास्तविक पहचान को सीमित करने का प्रयास माना जा रहा है।

सभा को संबोधित करते हुए सर्व आदिवासी समाज युवा प्रभाग के जिला अध्यक्ष बी.पी.एस. पोया ने कहा कि “आदिवासी” शब्द समुदाय की ऐतिहासिक और सामाजिक पहचान का प्रतीक है। उन्होंने आरोप लगाया कि “वनवासी” शब्द न तो ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित है और न ही यह आदिवासी समाज की वास्तविक स्थिति को दर्शाता है। उन्होंने कहा कि भारतीय संविधान ने आदिवासी समुदाय को अनुसूचित जनजाति के रूप में मान्यता दी है और उन्हें समानता, सम्मान, सांस्कृतिक संरक्षण तथा विकास के अधिकार प्रदान किए हैं। ऐसे में किसी भी भ्रामक शब्दावली का उपयोग संविधान की भावना के विपरीत माना जाना चाहिए।

प्रदर्शनकारियों ने केंद्रीय गृह मंत्री से सार्वजनिक रूप से माफी मांगने की मांग भी उठाई। समाज के प्रतिनिधियों ने चेतावनी दी कि यदि भविष्य में भी इस प्रकार के शब्दों का प्रयोग किया जाता है, तो ग्राम स्तर से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक लोकतांत्रिक और संवैधानिक तरीके से व्यापक आंदोलन चलाया जाएगा।

कार्यक्रम के समापन पर राष्ट्रपति और राज्यपाल के नाम ज्ञापन प्रशासनिक अधिकारियों को सौंपा गया। ज्ञापन में आदिवासी समाज की पहचान और सम्मान से जुड़े मुद्दों पर गंभीरता से विचार करने तथा भविष्य में ऐसी टिप्पणियों से बचने की मांग की गई। समाज के पदाधिकारियों ने स्पष्ट किया कि उनका आंदोलन पूरी तरह संवैधानिक और लोकतांत्रिक दायरे में है तथा अपनी सांस्कृतिक अस्मिता और अधिकारों की रक्षा के लिए वे लगातार आवाज उठाते रहेंगे।

प्रदर्शन में समाज के कई वरिष्ठ पदाधिकारी, विभिन्न ब्लॉकों के प्रतिनिधि, युवा कार्यकर्ता तथा बड़ी संख्या में आम नागरिक शामिल हुए, जिससे यह विरोध प्रदर्शन जिले में चर्चा का प्रमुख विषय बन गया।

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