बस्तर संभाग में आंखों की दो गंभीर बीमारियां—कोर्निया अल्सर (Corneal Ulcer) और यूवाइटिस (Uveitis)—लोगों की दृष्टि के लिए बड़ा खतरा बनकर उभर रही हैं। छत्तीसगढ़ के एकमात्र शासकीय मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल डिमरापाल के नेत्र विभाग में किए गए शोध में ऐसे कई तथ्य सामने आए हैं, जो स्वास्थ्य व्यवस्था और जनजागरूकता दोनों के लिए चिंता का विषय हैं। मेडिकल कॉलेज के दो युवा शोधकर्ताओं द्वारा किए गए अध्ययन में पाया गया कि इन दोनों बीमारियों के कारण हर साल सैकड़ों लोग अपनी आंखों की रोशनी खोने के खतरे से जूझ रहे हैं।
शोध के अनुसार, बस्तर के ग्रामीण इलाकों में खेती-किसानी और जंगल आधारित कार्यों के दौरान आंखों में लगने वाली मामूली चोटें आगे चलकर कोर्निया अल्सर जैसी गंभीर बीमारी का रूप ले रही हैं। वहीं शरीर में संक्रमण, जोड़ों के दर्द, चोट और अन्य आंतरिक बीमारियां यूवाइटिस के मामलों को बढ़ा रही हैं। सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि समय पर इलाज नहीं मिलने पर इन बीमारियों से स्थायी अंधत्व तक हो सकता है।
मेडिकल छात्र एवं शोधकर्ता डॉ. विनीत कौशिक ने बताया कि कोर्निया अल्सर पर किए गए अध्ययन में 85 मरीजों को शामिल किया गया था। शोध में पाया गया कि धान की बालियां, लकड़ी की टहनियां, घास-फूस और वन उत्पादों के संपर्क से आंखों में लगी चोटें संक्रमण का कारण बन रही हैं। शुरुआत में आंख लाल होना, दर्द होना, पानी आना और धुंधला दिखाई देना जैसे लक्षण सामने आते हैं, लेकिन अधिकांश लोग इन्हें सामान्य समस्या मानकर नजरअंदाज कर देते हैं। यही लापरवाही बाद में गंभीर संक्रमण और दृष्टि हानि का कारण बन जाती है।
अध्ययन के मुताबिक, जिन मरीजों ने चोट लगने के सात दिनों के भीतर उपचार शुरू कराया, उनमें से लगभग 60 प्रतिशत की आंखों की रोशनी काफी हद तक वापस लाई जा सकी। वहीं लगभग 30 प्रतिशत मरीजों की दृष्टि पहले जैसी नहीं हो पाई और 5 से 10 प्रतिशत मरीज ऐसे पाए गए जिनकी आंखों की रोशनी पूरी तरह समाप्त होने की स्थिति तक पहुंच गई।
दूसरी ओर यूवाइटिस पर किए गए अध्ययन में 103 मरीजों का विश्लेषण किया गया। शोधकर्ता डॉ. श्रुति कंवर ने बताया कि इस बीमारी से प्रभावित मरीजों में महिलाओं की संख्या अपेक्षाकृत अधिक पाई गई। यूवाइटिस आंख के अंदर मौजूद यूविया परत में होने वाली सूजन है, जो कई बार शरीर में पहले से मौजूद संक्रमण, चोट या अन्य बीमारियों से जुड़ी होती है। इस बीमारी में आंखों में दर्द, तेज रोशनी से परेशानी, धुंधलापन और धीरे-धीरे दृष्टि कमजोर होने जैसे लक्षण दिखाई देते हैं।
शोध में यह भी सामने आया कि 30 से 50 वर्ष आयु वर्ग की महिलाओं में यूवाइटिस के मामले अधिक हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि महिलाओं के शरीर की जैविक संरचना और प्रतिरक्षा प्रणाली से जुड़ी कुछ विशेषताओं के कारण उनमें यह बीमारी अपेक्षाकृत ज्यादा देखने को मिलती है। डॉक्टरों ने चेतावनी दी है कि यदि उपचार अधूरा छोड़ दिया जाए तो बीमारी दोबारा लौट सकती है और आंखों को स्थायी नुकसान पहुंचा सकती है।
नेत्र विभागाध्यक्ष डॉ. छाया शोरी ने बताया कि ग्रामीण क्षेत्रों में जागरूकता की कमी भी एक बड़ी समस्या है। कई लोग आंखों में चोट लगने या दर्द होने पर अस्पताल जाने के बजाय झाड़-फूंक, घरेलू नुस्खों और बिना चिकित्सकीय सलाह के दवाओं का सहारा लेते हैं। कुछ मामलों में आंखों में तेल, जड़ी-बूटी या अन्य पदार्थ तक डाल दिए जाते हैं, जिससे संक्रमण और अधिक खतरनाक हो जाता है।
डॉ. शोरी ने लोगों से अपील की है कि आंखों में किसी भी प्रकार की चोट, दर्द, जलन, लालिमा या धुंधलापन दिखाई देने पर तुरंत नेत्र विशेषज्ञ से संपर्क करें। उनका कहना है कि शुरुआती चरण में इलाज मिलने पर कोर्निया अल्सर और यूवाइटिस दोनों का सफल उपचार संभव है, लेकिन देरी होने पर मरीजों को ऑपरेशन या जटिल उपचार की आवश्यकता पड़ सकती है और कई बार आंखों की रोशनी वापस लाना संभव नहीं हो पाता।
डिमरापाल मेडिकल कॉलेज में हुए इस शोध ने स्पष्ट संकेत दिया है कि बस्तर में कोर्निया अल्सर और यूवाइटिस अब केवल सामान्य नेत्र रोग नहीं रह गए हैं, बल्कि ये दृष्टिहीनता की बड़ी वजह बनते जा रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि जागरूकता, समय पर जांच और शुरुआती उपचार ही लोगों की आंखों की रोशनी बचाने का सबसे प्रभावी उपाय है। विशेष रूप से ग्रामीण और वनांचल क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को आंखों की छोटी से छोटी समस्या को भी गंभीरता से लेने की आवश्यकता है, ताकि उनकी दुनिया अंधेरे में जाने से बच सके।