11जून2026
दंतेवाड़ा/रायपुर। लगभग चार दशक से विवादों और विरोध के कारण ठंडे बस्ते में पड़ी बोधघाट बहुउद्देशीय परियोजना एक बार फिर सुर्खियों में है। छत्तीसगढ़ सरकार ने दंतेवाड़ा जिले में परियोजना के लिए सर्वेक्षण कार्य शुरू कर दिया है। इंद्रावती नदी पर प्रस्तावित इस बांध से करीब 56 गांवों के पूरी तरह या आंशिक रूप से प्रभावित होने की आशंका जताई जा रही है, जिससे स्थानीय आदिवासी समुदायों में विस्थापन और पुनर्वास को लेकर चिंता बढ़ गई है।
दंतेवाड़ा कलेक्टर देवेश कुमार ध्रुव ने सर्वे शुरू होने की पुष्टि करते हुए कहा कि विभिन्न विभागों और एजेंसियों के सहयोग से विस्तृत अध्ययन किया जा रहा है। परियोजना की संशोधित डीपीआर के अनुसार लगभग 10,441 हेक्टेयर क्षेत्र जलमग्न हो सकता है, जबकि 5,700 हेक्टेयर से अधिक वन भूमि भी डूब क्षेत्र में आने की संभावना है।
वर्ष 1979 में प्रस्तावित बोधघाट परियोजना को 1984 में विश्व बैंक से वित्तीय स्वीकृति मिली थी, लेकिन आदिवासी विरोध, वन विनाश और पुनर्वास संबंधी चिंताओं के चलते 1987 में इसे रोक दिया गया था। वर्ष 2020 में परियोजना को फिर से जीवित करने की प्रक्रिया शुरू हुई और संशोधित डीपीआर तैयार करने का जिम्मा WAPCOS लिमिटेड को सौंपा गया।
करीब 30 हजार करोड़ रुपये की अनुमानित लागत वाली इस परियोजना से सिंचाई, पेयजल आपूर्ति और बिजली उत्पादन में वृद्धि का दावा किया जा रहा है। प्रस्तावित बांध से प्रारंभिक तौर पर 125 मेगावाट जलविद्युत उत्पादन होगा, जिसे भविष्य में 300 मेगावाट तक बढ़ाया जा सकता है।
हालांकि, स्थानीय ग्रामीणों और सामाजिक संगठनों ने परियोजना पर सवाल उठाए हैं। सर्व आदिवासी समाज के पदाधिकारियों और प्रभावित गांवों के लोगों का कहना है कि अब तक पुनर्वास, मुआवजा और ग्राम सभा की सहमति को लेकर कोई स्पष्ट जानकारी नहीं दी गई है। छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन ने भी प्रभावित ग्राम सभाओं की मंजूरी के बिना आगे की प्रक्रिया नहीं बढ़ाने की मांग की है।
फिलहाल प्रशासन का कहना है कि केवल सर्वेक्षण कार्य चल रहा है और लोगों की सभी आशंकाओं का समाधान किया जाएगा। लेकिन बोधघाट परियोजना की वापसी ने एक बार फिर विकास और विस्थापन के बीच बहस को तेज कर दिया है।