2मई 2026
केरल में मंदिर उत्सवों के दौरान बंदी हाथियों के बढ़ते हमले अब एक गंभीर सामाजिक और सुरक्षा संकट के रूप में सामने आ रहे हैं। 1 मई को राज्य में कुछ ही घंटों के भीतर हुई दो दर्दनाक घटनाओं ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया। पहली घटना अंगमाली के किडंगूर महाविष्णु मंदिर क्षेत्र में हुई, जहां उत्सव के दौरान मस्त अवस्था में बताए जा रहे हाथी ने अचानक नियंत्रण खो दिया और भगदड़ जैसी स्थिति पैदा कर दी। इस हादसे में कोल्लम निवासी 40 वर्षीय विष्णु की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि महावत भी गंभीर रूप से घायल हो गया।
इसके बाद त्रिशूर के प्रसिद्ध कूडलमणिक्यम मंदिर में दूसरी त्रासदी सामने आई, जहां एक अन्य बंदी हाथी ने अपने सहायक महावत पर हमला कर उसे कुचल दिया। इस घटना में 25 वर्षीय श्रीकुट्टन की जान चली गई, जबकि मुख्य महावत गंभीर रूप से घायल हो गया। इन दोनों घटनाओं ने मंदिर उत्सवों में हाथियों के उपयोग को लेकर लंबे समय से चल रही बहस को और तेज कर दिया है।
बीते चार महीनों में केरल में बंदी हाथियों से जुड़े हमलों में सात लोगों की मौत हो चुकी है। विशेषज्ञों के अनुसार भीषण गर्मी, लगातार शोर-शराबा, भीड़भाड़ और लंबे समय तक उत्सवों में शामिल रहने का दबाव हाथियों के व्यवहार को असामान्य और आक्रामक बना देता है। पशु चिकित्सकों और वन्यजीव विशेषज्ञों का कहना है कि हाथियों की प्राकृतिक जरूरतों की अनदेखी और परंपराओं के नाम पर उन पर बढ़ता दबाव न केवल मानव जीवन बल्कि पशु कल्याण के लिए भी खतरनाक साबित हो रहा है।
इन हादसों के बाद पशु अधिकार संगठनों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और आम नागरिकों ने मंदिर आयोजनों में हाथियों के इस्तेमाल पर कड़ी समीक्षा की मांग की है। कई संगठनों ने इसे क्रूर परंपरा बताते हुए तत्काल प्रतिबंध लगाने की आवाज बुलंद की है। अब बहस केवल धार्मिक परंपरा तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह सवाल उठने लगा है कि क्या किसी परंपरा की कीमत इंसानी जान और पशुओं की पीड़ा से चुकाई जानी चाहिए। केरल में बार-बार हो रही ऐसी घटनाएं संकेत दे रही हैं कि समय रहते ठोस नीति और सुरक्षा उपाय नहीं अपनाए गए, तो आने वाले दिनों में यह संकट और भयावह रूप ले सकता है।