रंग, राग और व्यंग्य की बौछार: होली से पहले सर्किट हाउस रोड पर सजी काव्य महफिल

जगदलपुर | दिनांक – 1 मार्च 2026
होली की आहट के साथ शहर में साहित्यिक रंग भी घुलने लगे हैं। सर्किट हाउस रोड, जगदलपुर में साहित्य एवं कला समाज द्वारा आयोजित काव्य गोष्ठी में कवियों ने अपनी रंगीन और गुदगुदाती रचनाओं से माहौल को पूरी तरह फागुनी बना दिया। कार्यक्रम में शहर और आसपास के रचनाकारों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया।
गोष्ठी का शुभारंभ विपिन बिहारी दास ने अपनी नई ग़ज़लों से किया। दोस्ती और दुश्मनी पर उनके शेरों ने खूब तालियां बटोरीं। इसके बाद “रुक जाओ चांद सितारों की रात अभी बाकी है…” जैसी पंक्तियों ने श्रोताओं को रोमांटिक रंग में रंग दिया।
अंचल के लोकप्रिय गीतकार अवधकिशोर शर्मा ने चुटीले अंदाज़ में राजनीति पर व्यंग्य कसते हुए नवगीत प्रस्तुत किया। “गूंथ रही है डोकरी माला…” जैसे गीतों ने समाज की विडंबनाओं को सहज अंदाज़ में सामने रखा।
राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त अंजली मिश्रा ने सस्वर पाठ से श्रोताओं का मन मोह लिया। कान्हा के प्रति समर्पित उनकी रचना ने वातावरण को भक्तिमय बना दिया। वहीं ऋषि शर्मा ‘ऋषि’ ने अपनी ग़ज़लों से कार्यक्रम को संगीतमय बना दिया।
डालेश्वरी पाण्डे ने मधुर स्वर में व्यंग्य रचना सुनाकर महंगाई पर तंज कसा और हल्बी गीत से स्थानीय रंग भी बिखेरा। बकावंड से पहली बार शामिल हुईं नीता पाण्डे ने व्यंग्य के साथ मां दंतेश्वरी की स्तुति प्रस्तुत कर सराहना पाई।
होली के मौके पर सुरेंद्र कुमार और ममता मधु ने फागुन की मस्ती से सराबोर रचनाएं सुनाईं। “फागुन हूं मैं…” जैसे गीतों ने रंगों की उमंग को और गहरा किया। सूरज कश्यप ने भी लंबे अंतराल के बाद मंच पर वापसी करते हुए अपनी रचनाओं से दूसरी पारी की शुरुआत की।
कार्यक्रम का संचालन सनत सागर ने किया। उन्होंने अपने व्यंग्य में सामाजिक बदलाव और दिखावे पर करारा प्रहार किया। गृहिणी के नजरिए से लिखा गया उनका प्रेमगीत श्रोताओं के बीच विशेष आकर्षण का केंद्र रहा।
कार्यक्रम में जगतदीदी अनिता दीदी, कस्तूरी मिश्रा, श्रीमती शोभा शर्मा सहित कई साहित्य प्रेमियों की उपस्थिति रही।
गोष्ठी के अंत में सनत सागर ने 7 मार्च को सिरहासार में आयोजित होने वाले संभागीय हास्य कवि सम्मेलन की जानकारी दी। स्वल्पाहार के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ, लेकिन श्रोताओं के मन में होली के रंग और कविता की मिठास देर तक बनी रही।
होली से पहले इस काव्य गोष्ठी ने यह साबित कर दिया कि बस्तर में रंग केवल गुलाल के नहीं, शब्दों के भी उड़ते हैं

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