डॉक्टर बनने का सपना टूटा, आईएएस बनकर रचा इतिहासबस्तर कलेक्टर ने युवाओं में भरा आत्मविश्वास


जगदलपुर, 17 जनवरी 2026/ परीक्षाओं के मौसम में अक्सर विद्यार्थियों के मन में घर कर जाने वाले असफलता के डर को दूर करने और उन्हें मानसिक रूप से सशक्त बनाने के उद्देश्य से शनिवार को बस्तर विकासखंड मुख्यालय में एक बेहद सार्थक पहल देखने को मिली। भारतीय रेड क्रॉस सोसायटी के तत्वावधान में आयोजित इस प्रेरणादायक कार्यक्रम में बस्तर कलेक्टर हरिस एस. ने लगभग साढ़े चार सौ स्कूली और महाविद्यालयीन छात्र-छात्राओं से सीधा संवाद किया। इस दौरान वे केवल एक प्रशासनिक अधिकारी के तौर पर नहीं, बल्कि एक मार्गदर्शक के रूप में नजर आए जिन्होंने युवाओं को समझाया कि जीवन में हारना अंत नहीं, बल्कि सीखने की प्रक्रिया का ही एक हिस्सा है और एक परीक्षा का परिणाम कभी भी जीवन की दिशा तय नहीं करता।
कार्यक्रम का माहौल उस वक्त बेहद संजीदा और प्रेरणादायी हो गया जब छात्रों का मनोबल बढ़ाते हुए कलेक्टर ने अपने जीवन की ‘खुली किताब’ उनके सामने रख दी। छात्रों को जीवन की वास्तविकताओं से रूबरू कराते हुए उन्होंने बताया कि वे स्वयं डॉक्टर बनने का सपना देखते थे, लेकिन मेडिकल एंट्रेंस परीक्षा में महज 0.75 अंकों से चूक गए थे। उस दौर में करियर विकल्पों की सही जानकारी न होने के कारण उन्होंने बेमन से मैकेनिकल इंजीनियरिंग की और बाद में एक सॉफ्टवेयर कंपनी में नौकरी भी की, जिसका उनकी पढ़ाई से कोई सरोकार नहीं था। उन्होंने बड़ी बेबाकी से स्वीकार किया कि उनके जीवन के चार साल एक तरह से बर्बाद हुए, लेकिन उन्होंने कभी हिम्मत नहीं हारी। अपनी कमियों को पहचाना, यूपीएससी की तैयारी की और अंततः सफलता हासिल की। अपने इस संघर्षपूर्ण सफर का उदाहरण देते हुए उन्होंने छात्रों को समझाया कि सफलता की कोई निश्चित उम्र नहीं होती—कोई 30 साल में सफल होता है तो कोई 50 में, लेकिन जो निरंतर प्रयास करता है, उसकी जीत तय है।
बस्तर के युवाओं में करियर को लेकर सीमित सोच पर चिंता जाहिर करते हुए कलेक्टर ने एक महत्वपूर्ण मुद्दा भी उठाया। उन्होंने कहा कि यहाँ के बच्चे जब भविष्य के बारे में सोचते हैं, तो उनके पास अक्सर पुलिस, शिक्षक, डॉक्टर, इंजीनियर या सरकारी कर्मचारी जैसे गिने-चुने पांच विकल्प ही होते हैं। उन्होंने छात्रों का आह्वान किया कि वे अपनी सोच का दायरा बढ़ाएं, क्योंकि आज का दौर स्टार्टअप, अपना बिजनेस और उद्यमिता (आंत्रप्रेन्योरशिप) का है। उन्होंने जोर देकर कहा कि बस्तर का असली विकास यहाँ बन रही सड़कों या इमारतों से नहीं, बल्कि यहाँ की आने वाली पीढ़ी की तरक्की और उनकी विस्तृत सोच से होगा। उन्होंने छात्रों को इंटरनेट और शिक्षकों की मदद से अपनी वास्तविक रुचि पहचानने के लिए प्रेरित किया, ताकि वे भविष्य में केवल नौकरी मांगने वाले नहीं, बल्कि दूसरों को नौकरी देने वाले बन सकें।
इस संवाद सत्र में सहायक कलेक्टर  विपिन दुबे ने भी विद्यार्थियों को परीक्षा में सफलता के व्यावहारिक टिप्स दिए। उन्होंने बताया कि कैसे बिना दबाव के, शांत मन और सही रणनीति के साथ की गई तैयारी बेहतर परिणाम लाती है। उन्होंने कार्यक्रम स्थल पर रेड क्रॉस सोसायटी द्वारा लगाए गए बैनर, जिन पर ‘जीवन बहुत बड़ा है—एक परीक्षा सब कुछ नहीं होती’ और ‘डर के आगे जीत है’ जैसे वाक्य लिखे थे, ने पूरे वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा भर दी। अंत में अभिभावकों और छात्रों के रिश्तों पर बात करते हुए कलेक्टर ने समझाया कि माता-पिता का दबाव परिवार के जीवन स्तर को सुधारने की चाहत से जुड़ा होता है, इसलिए कम नंबर आने पर किस्मत को दोष देने के बजाय अपनी मेहनत का विश्लेषण करना ही समझदारी है। प्रशासन और रेड क्रॉस की यह साझा मुहिम युवाओं में ‘नेवर गिव अप’ का जज्बा जगाने में पूरी तरह सफल रही।
इस दौरान अनुविभागीय दंडाधिकारी  गगन शर्मा, जिला शिक्षा अधिकारी बीआर बघेल, तहसीलदार  जॉली जेम्स, जनपद पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी  भानुप्रताप चुरेंद्र, खंड शिक्षा अधिकारी  भारती देवांगन, खंड चिकित्सा अधिकारी डॉ नारायण नाग, मुख्य नगरपालिका अधिकारी  तरुणपाल लहरे, एबीईओ सुशील तिवारी, रेडक्रॉस जिला उपाध्यक्ष अलेक्कजेंडर चेरियन उपस्थित थे।
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