47 वर्षीय रमाबाई रणवीर ने युवा धावकों को पछाड़कर जीती अमृत दौड़, 3 हजार रुपये का मिला पुरस्कार; संघर्ष और जज्बे की कहानी बनी मिसाल
महराष्ट्र बीड/अंबाजोगाई। 1सितंबर 2026/उम्र, पहनावा और साधनों की कमी किसी इंसान के हौसले से बड़ी नहीं होती। महाराष्ट्र के बीड जिले के अंबाजोगाई में 47 वर्षीय रमाबाई रणवीर ने अपने जज्बे और दृढ़ इच्छाशक्ति से इसी बात को साबित कर दिखाया। बेटियों के बेहतर भविष्य की उम्मीद लेकर वह मैराथन में उतरीं और देखते ही देखते युवा प्रतिभागियों को पीछे छोड़ते हुए प्रतियोगिता की विजेता बन गईं।
अंबाजोगाई में आयोजित ‘अमृत दौड़’ में बड़ी संख्या में प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया था। प्रतियोगिता की शुरुआत छत्रपति शिवाजी महाराज चौक से हुई, जबकि दौड़ का समापन भाग्यनगर चौक पर हुआ। जहां अधिकांश प्रतिभागी ट्रैकसूट और स्पोर्ट्स शूज के साथ पूरी तैयारी में पहुंचे थे, वहीं रमाबाई साधारण साड़ी और चप्पल पहनकर दौड़ में शामिल हुईं।
चप्पल बनी रफ्तार में बाधा तो बिना झिझक उतार दी
दौड़ शुरू होते ही रमाबाई ने पूरी ताकत से कदम बढ़ाए। कुछ दूरी तय करने के बाद उनकी चप्पल बार-बार फिसलने लगी। चप्पल के कारण रफ्तार कम होती देख उन्होंने समय गंवाने के बजाय दोनों चप्पलें हाथ में उठा लीं और नंगे पैर ही दौड़ जारी रखी।
इसके बाद रास्ते में कंकड़-पत्थर और साड़ी को संभालने जैसी मुश्किलें भी सामने आईं, लेकिन रमाबाई ने किसी बाधा को अपनी मंजिल के बीच नहीं आने दिया। उन्होंने साड़ी संभालते हुए अपनी गति बनाए रखी और लगातार दूसरे प्रतिभागियों को पीछे छोड़ती चली गईं।
युवा धावकों को पछाड़कर हासिल किया पहला स्थान
रमाबाई के सामने ऐसे कई प्रतिभागी थे, जो स्पोर्ट्स ड्रेस और आधुनिक रनिंग शूज के साथ दौड़ रहे थे। इसके बावजूद उनका आत्मविश्वास और जुनून उन्हें लगातार आगे ले जाता रहा। आखिरकार उन्होंने सबसे पहले फिनिशिंग लाइन पार कर पहला स्थान हासिल कर लिया।
रमाबाई की जीत ने प्रतियोगिता में मौजूद लोगों को भी भावुक कर दिया। उनकी साधारण वेशभूषा, नंगे पैर दौड़ने का फैसला और आखिरी तक हार न मानने वाले जज्बे ने सभी का ध्यान अपनी ओर खींचा। दर्शकों और आयोजकों ने तालियों के साथ उनके साहस और मेहनत की सराहना की।
‘जीतने नहीं, उम्मीद लेकर दौड़ी थी’
रमाबाई का कहना है कि वह प्रतियोगिता में जीत की उम्मीद लेकर नहीं आई थीं। उनके मन में सिर्फ अपनी बेटियों के भविष्य को बेहतर बनाने और कुछ कर दिखाने का जज्बा था। उन्होंने परिस्थितियों को अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया और दौड़ को पूरा करने के साथ ही उसे जीतकर दिखा दिया।
प्रतियोगिता में प्रथम स्थान हासिल करने पर रमाबाई को 3,000 रुपये की पुरस्कार राशि दी गई। उनकी यह जीत सिर्फ एक मैराथन की जीत नहीं रही, बल्कि संघर्ष, आत्मविश्वास और मातृत्व के संकल्प की प्रेरणादायक कहानी बन गई।
रमाबाई रणवीर की कहानी यह संदेश देती है कि मंजिल तक पहुंचने के लिए महंगे जूते या विशेष सुविधाओं से ज्यादा जरूरी मजबूत हौसला और खुद पर विश्वास होता है। साड़ी में शुरू हुई उनकी दौड़ जब जीत के साथ खत्म हुई, तो उन्होंने साबित कर दिया कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, दृढ़ निश्चय रखने वाला व्यक्ति अपनी राह खुद बना सकता है।