हरेली तिहार: हरियाली, खेती और लोकपरंपरा का उत्सव, जानिए क्यों खास है छत्तीसगढ़ का यह पहला लोक-पर्व

रायपुर, 11 अगस्त 2026। छत्तीसगढ़ की पहचान केवल यहां की हरियाली, जंगल और प्राकृतिक संपदा से नहीं, बल्कि समृद्ध लोक-संस्कृति और सदियों पुरानी परंपराओं से भी है। इन्हीं परंपराओं में हरेली तिहार का विशेष स्थान है। सावन अमावस्या के अवसर पर मनाया जाने वाला यह पर्व खेती-किसानी, प्रकृति, पशुधन और ग्रामीण जीवन के बीच गहरे रिश्ते को दर्शाता है।

हरेली को छत्तीसगढ़ के प्रमुख लोक-पर्वों की शुरुआत माना जाता है। बारिश के मौसम में जब खेतों में हरियाली दिखाई देने लगती है और धान की फसल अपने शुरुआती दौर में होती है, तब किसान इस पर्व के माध्यम से प्रकृति और कृषि से जुड़े साधनों के प्रति आभार व्यक्त करते हैं। गांवों में इस दिन उत्सव का माहौल रहता है और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ पूजा-अर्चना की जाती है।

खेती के औजारों की पूजा, किसान जताते हैं कृतज्ञता

हरेली तिहार का सबसे महत्वपूर्ण पहलू कृषि उपकरणों की पूजा है। किसान अपने हल, फावड़ा, कुदाल, खुर्पी, बसुला, हथौड़ी, आरी और खेती में इस्तेमाल होने वाले दूसरे औजारों को साफ करते हैं। इसके बाद उन्हें विधि-विधान से पूजा जाता है।

पूजा के दौरान फूल, चंदन, धूप-दीप, अक्षत और पारंपरिक पकवानों का इस्तेमाल किया जाता है। कई स्थानों पर चीला जैसे छत्तीसगढ़ी व्यंजन का भोग भी लगाया जाता है। इसके पीछे भावना यह है कि जिन औजारों की मदद से किसान पूरे साल खेती का काम करते हैं, उनके प्रति सम्मान और आभार व्यक्त किया जाए।

यह परंपरा खेती को केवल आजीविका नहीं, बल्कि जीवन और प्रकृति से जुड़ी जिम्मेदारी के रूप में देखने की छत्तीसगढ़ी सोच को सामने लाती है।

पशुधन के प्रति भी सम्मान का पर्व

हरेली में कृषि के साथ पशुधन का भी विशेष महत्व है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था में बैल और अन्य पशुओं की भूमिका लंबे समय से महत्वपूर्ण रही है। इसलिए इस अवसर पर पशुधन की देखभाल और उनके प्रति सम्मान की परंपरा भी दिखाई देती है।

किसान अपने पशुओं को सजाते-संवारते हैं और उनके स्वस्थ रहने की कामना करते हैं। खेती और पशुधन के इस संबंध को हरेली तिहार बेहद सहज तरीके से सामने लाता है।

नीम की डालियां लगाने की पुरानी मान्यता

हरेली से जुड़ी ग्रामीण परंपराओं में नीम का भी खास स्थान है। कई गांवों में घर के मुख्य दरवाजे पर नीम की टहनियां लगाने की परंपरा है। स्थानीय मान्यताओं में इसे बीमारियों और नकारात्मक प्रभावों से घर-परिवार की सुरक्षा से जोड़कर देखा जाता है।

ग्रामीण जीवन में नीम का इस्तेमाल पारंपरिक रूप से औषधीय और स्वास्थ्य संबंधी जरूरतों के लिए भी किया जाता रहा है। इसी वजह से हरेली की परंपराओं में नीम का उपयोग प्रकृति और लोक-ज्ञान के मेल का उदाहरण माना जा सकता है।

गेड़ी पर चढ़कर बच्चे और युवा मनाते हैं उत्सव

हरेली की पहचान पारंपरिक खेलों से भी जुड़ी हुई है। इनमें गेड़ी सबसे लोकप्रिय है। बांस से बनाई जाने वाली गेड़ी पर चढ़कर बच्चे और युवा गांव की गलियों में घूमते और अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं।

आज के डिजिटल दौर में जब पारंपरिक खेल धीरे-धीरे पीछे छूट रहे हैं, हरेली जैसे त्योहार इन खेलों को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का माध्यम बनते हैं। गेड़ी केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि ग्रामीण जीवन और स्थानीय संस्कृति की पहचान भी है।

प्रकृति के साथ रिश्ते का संदेश देता है हरेली

हरेली तिहार का सबसे बड़ा संदेश प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का है। किसान बारिश, मिट्टी, खेत, पेड़-पौधों और पशुधन पर निर्भर रहता है। इसलिए यह पर्व मनुष्य और प्रकृति के बीच परस्पर निर्भरता को रेखांकित करता है।

सावन में चारों तरफ फैली हरियाली के बीच मनाया जाने वाला यह पर्व ग्रामीण जीवन की उस सोच को सामने लाता है, जिसमें प्रकृति को केवल संसाधन नहीं बल्कि जीवन का आधार माना जाता है।

लोकगीतों और पारंपरिक खेलों से जीवंत होती है संस्कृति

हरेली के अवसर पर गांवों में लोकगीत, पारंपरिक खेल और सामूहिक गतिविधियां उत्सव का रंग बढ़ा देती हैं। परिवार और समाज के लोग एक साथ मिलकर त्योहार मनाते हैं। इस तरह हरेली केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं रहता, बल्कि सामाजिक मेल-जोल और सामुदायिक एकता का अवसर भी बन जाता है।

छत्तीसगढ़ के लोकजीवन में हरेली के साथ भोजली, जंवारा और अन्य पारंपरिक पर्व भी प्रकृति और मौसम के बदलाव से जुड़े हुए हैं। इन सभी त्योहारों में स्थानीय संस्कृति, कृषि और प्रकृति का सुंदर समन्वय देखने को मिलता है।

नई पीढ़ी के लिए विरासत बचाने का अवसर

आज जब तेजी से बदलती जीवनशैली के कारण कई पारंपरिक रीति-रिवाज और ग्रामीण खेल पीछे छूट रहे हैं, ऐसे में हरेली जैसे लोक-पर्व सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाने का काम करते हैं। यह त्योहार नई पीढ़ी को अपनी मिट्टी, खेती, प्रकृति और पारंपरिक जीवनशैली से जोड़ने का अवसर देता है।

हरेली की असली खूबसूरती इसी बात में है कि इसमें किसान, खेत, औजार, पशुधन, प्रकृति और लोक-संस्कृति—सभी एक साथ दिखाई देते हैं। यही वजह है कि छत्तीसगढ़ के लोगों के लिए यह पर्व सिर्फ कैलेंडर की एक तारीख नहीं, बल्कि अपनी जड़ों और परंपराओं को याद करने का उत्सव है।

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