बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक सजायाफ्ता कैदी को उसकी बहन की विदाई में शामिल होने की अनुमति देकर मानवीय संवेदनाओं को महत्व देने वाला फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि गंभीर अपराध में दोषी होने के कारण उसे अंतरिम जमानत नहीं दी जा सकती, लेकिन पारिवारिक जिम्मेदारियों को देखते हुए पुलिस अभिरक्षा में समारोह में शामिल होने की अनुमति दी जा सकती है।
यह मामला भिलाई के सुपेला कृष्णानगर निवासी मनीष बंसोर से जुड़ा है, जिसे डकैती और आपराधिक साजिश के मामले में विशेष अदालत ने 18 नवंबर 2025 को दोषी ठहराते हुए 10 वर्ष के सश्रम कारावास की सजा सुनाई थी। फिलहाल वह जेल में अपनी सजा काट रहा है।
मनीष ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर बताया कि उसकी सगी बहन की शादी है और परिवार में उसके अलावा कोई दूसरा भाई नहीं है, जो विदाई जैसी महत्वपूर्ण पारिवारिक रस्म निभा सके। इसी आधार पर उसने कुछ दिनों की अंतरिम जमानत की मांग की थी।
सुनवाई के दौरान राज्य शासन ने जमानत का विरोध करते हुए कहा कि आरोपी गंभीर अपराध में सजायाफ्ता है, इसलिए उसे जेल से रिहा करना उचित नहीं होगा। हालांकि शासन ने यह भी कहा कि यदि न्यायालय उचित समझे तो उसे पुलिस सुरक्षा के बीच विवाह समारोह में ले जाया जा सकता है।
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने अंतरिम जमानत देने से इनकार कर दिया, लेकिन मानवीय आधार पर कैदी को बहन की विदाई में शामिल होने की अनुमति दे दी। अदालत ने कहा कि कानून के साथ-साथ सामाजिक और पारिवारिक मूल्यों का भी सम्मान किया जाना चाहिए।
हाईकोर्ट ने केंद्रीय जेल अधीक्षक और दुर्ग पुलिस अधीक्षक को निर्देश दिए हैं कि निर्धारित तिथि पर पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था के साथ मनीष बंसोर को भिलाई स्थित विवाह स्थल ले जाया जाए। विदाई की रस्म पूरी होने के बाद उसे तत्काल वापस जेल भेजा जाएगा।
हाईकोर्ट का यह फैसला इस बात का उदाहरण माना जा रहा है कि न्यायालय कानून की सीमाओं का पालन करते हुए भी मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक दायित्वों के बीच संतुलन बनाने का प्रयास करता है।