5जून2026
बालोद/दल्लीराजहरा। लौह अयस्क की खदानों से करोड़ों रुपये का राजस्व देने वाला दल्लीराजहरा आज गंभीर पेयजल संकट से जूझ रहा है। शहर के कई वार्डों में नलों से पर्याप्त और स्वच्छ पानी नहीं पहुंचने के कारण लोग झरना मंदिर के पास जमीन से रिसने वाले झरिया के पानी पर निर्भर हैं। हालत यह है कि यही पानी पीने और खाना बनाने में इस्तेमाल किया जा रहा है।
जानकारी के अनुसार वार्ड क्रमांक 10, 12 और 18 सहित कई इलाकों में जलापूर्ति व्यवस्था चरमराई हुई है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि नलों में या तो पानी नहीं आता या फिर गंदा पानी सप्लाई होता है, जिससे वे मजबूरी में झरिया का पानी घर ले जाने को विवश हैं।
इस बीच 31 करोड़ रुपये की जल आवर्धन योजना भी सवालों के घेरे में है। छह साल पहले शुरू हुई यह परियोजना अब तक पूरी नहीं हो सकी है। देरी के चलते इसकी लागत बढ़कर 43 करोड़ रुपये तक पहुंच गई है, लेकिन शहरवासियों को अब भी पर्याप्त पेयजल नहीं मिल पा रहा है।
कांग्रेस के पूर्व नगर पालिका उपाध्यक्ष रवि जायसवाल ने आरोप लगाया कि दल्लीराजहरा, जिसे कभी “झरना दल्ली” के नाम से जाना जाता था, आज खुद पानी के लिए तरस रहा है। उनका कहना है कि केवल तीन वार्ड ही नहीं बल्कि शहर के सभी 27 वार्ड जल संकट से प्रभावित हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि जल आवर्धन योजना का काम जल्द पूरा नहीं हुआ तो कांग्रेस सड़क पर उतरकर आंदोलन करेगी।
वहीं नगर पालिका अध्यक्ष ने बताया कि योजना की लागत 31 करोड़ से बढ़ाकर 43 करोड़ रुपये की गई है। राष्ट्रीय राजमार्ग निर्माण के दौरान क्षतिग्रस्त हुई पाइपलाइन के पुनर्निर्माण के लिए भी राशि स्वीकृत की गई है और अगले एक वर्ष में परियोजना पूरी करने का प्रयास किया जाएगा।
प्रशासन ने भी मामले को गंभीरता से लेते हुए कहा है कि यदि लोग वास्तव में झरिया का पानी पीने को मजबूर हैं तो वैकल्पिक व्यवस्था की जाएगी। साथ ही योजना में देरी के कारणों की रिपोर्ट संबंधित विभागों से मांगी जाएगी।
अब बड़ा सवाल यह है कि खदानों से सरकार की तिजोरी भरने वाला दल्लीराजहरा आखिर कब तक बूंद-बूंद पानी के लिए तरसता रहेगा और करोड़ों की जल आवर्धन योजना धरातल पर कब दिखाई देगी?