जंगल छोड़ लौटे मुख्यधारा में” : झारखंड में 27 नक्सलियों का सरेंडर

22मई 2026

झारखंड में नक्सलवाद के खिलाफ चलाए जा रहे लगातार अभियानों के बीच गुरुवार को एक बड़ी सफलता सामने आई, जब 27 माओवादियों ने एक साथ आत्मसमर्पण कर मुख्यधारा में लौटने का फैसला किया। वर्षों तक जंगलों में सक्रिय रहे इन नक्सलियों ने हथियार छोड़ते हुए स्वीकार किया कि हिंसा और तथाकथित क्रांति के रास्ते से अब कुछ हासिल नहीं होने वाला।
समर्पण करने वाले पूर्व सेक्शन कमांडर गुलशन मुंडा ने कहा कि संगठन लगातार कमजोर होता जा रहा है और अब उन्हें समझ में आ गया है कि बंदूक के बल पर बदलाव संभव नहीं है। उन्होंने बताया कि कई मुठभेड़ों में शामिल रहने के बाद भी उन्हें यह एहसास हुआ कि हिंसा केवल तबाही लाती है। यही कारण है कि उन्होंने सामान्य जीवन में लौटने का निर्णय लिया।
आत्मसमर्पण करने वाली महिला नक्सली सुनीता उर्फ बारी सरदार ने भी संगठन की अंदरूनी स्थिति का जिक्र करते हुए कहा कि पहले जिन विचारों से प्रभावित होकर वह संगठन में शामिल हुई थीं, समय के साथ वे उम्मीदें टूटती चली गईं। संगठन में खाने-पीने और जरूरी संसाधनों तक की कमी होने लगी थी। लगातार दबाव और घटते जनसमर्थन के कारण संगठन कमजोर पड़ता गया।
दरअसल, झारखंड के सारंडा क्षेत्र को कभी माओवादी गतिविधियों का मजबूत गढ़ माना जाता था। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में सुरक्षा बलों की लगातार कार्रवाई और बड़े नेताओं की गिरफ्तारी के बाद संगठन की पकड़ ढीली पड़ने लगी। विशेष रूप से वरिष्ठ माओवादी नेता प्रशांत बोस की गिरफ्तारी के बाद नक्सलियों का नेटवर्क कमजोर हुआ और बाहरी संपर्क टूटने लगे।
सीआरपीएफ, झारखंड जगुआर और स्थानीय पुलिस द्वारा चलाए गए संयुक्त अभियानों ने नक्सल गतिविधियों पर लगातार दबाव बनाए रखा। जंगल क्षेत्रों में सुरक्षा कैंप और फॉरवर्ड ऑपरेशन बेस स्थापित किए जाने से माओवादियों की गतिविधियां सीमित होती चली गईं। जिन इलाकों में पहले नक्सली प्रभाव था, वहां अब विकास कार्यों और सुरक्षा व्यवस्था की पहुंच बढ़ी है।
झारखंड पुलिस की विशेष यूनिट ‘जगुआर’ ने भी इस अभियान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। ग्रेहाउंड मॉडल पर बनी यह फोर्स वर्षों से जंगल क्षेत्रों में अभियान चलाकर नक्सल नेटवर्क को कमजोर करने में जुटी रही है। कई मुठभेड़ों, गिरफ्तारियों और हथियार बरामदगी के जरिए सुरक्षा बलों ने संगठन की कमर तोड़ने का काम किया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि लगातार हो रहे आत्मसमर्पण यह संकेत दे रहे हैं कि झारखंड में नक्सलवाद अब अपने सबसे कमजोर दौर में पहुंच चुका है। सुरक्षा अभियान के साथ-साथ सरकार द्वारा विकास और पुनर्वास योजनाओं पर दिए जा रहे जोर का असर भी अब साफ दिखाई देने लगा है।

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