कोमा में जिंदगी, उम्मीद पर टिका परिवार—4 करोड़ खर्च कर भी बेटे के ‘मां-पापा’ कहने का इंतज़ार

18मार्च 2026

मुंबई से एक ऐसी मार्मिक कहानी सामने आई है, जो न सिर्फ दिल को झकझोर देती है बल्कि स्वास्थ्य व्यवस्था और इंसान की उम्मीद दोनों पर सवाल खड़े करती है।
35 वर्षीय आनंद दीक्षित पिछले ढाई साल से जिंदगी और मौत के बीच झूल रहे हैं। एक सड़क हादसे के बाद वे ‘वेजिटेटिव स्टेट’ में चले गए, जहां शरीर तो जिंदा है लेकिन किसी तरह की प्रतिक्रिया नहीं मिलती।
परिवार ने बेटे को बचाने की हर संभव कोशिश की। इलाज के लिए अब तक 4 करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च किए जा चुके हैं। जमीन-जायदाद बिक गई, बचत खत्म हो गई, यहां तक कि घर भी छिन गया। इसके बावजूद माता-पिता की उम्मीद अभी टूटी नहीं है।
परिवार का कहना है कि उन्होंने बड़े अस्पतालों में इलाज कराया, लेकिन आर्थिक बोझ इतना बढ़ गया कि उन्हें कर्ज तक लेना पड़ा। वहीं, बीमा कंपनी से भी मदद नहीं मिल सकी, जिससे मुश्किलें और बढ़ गईं।
इस बीच देश में इच्छामृत्यु को लेकर बहस तेज है, लेकिन आनंद का परिवार इस रास्ते को नहीं चुनना चाहता। उनके लिए हर सांस उम्मीद है—इस उम्मीद के साथ कि एक दिन उनका बेटा आंखें खोलेगा और उन्हें ‘मां-पापा’ कहकर पुकारेगा।
यह कहानी सिर्फ एक परिवार की नहीं, बल्कि उन हजारों लोगों की है जो लंबे इलाज, महंगे मेडिकल सिस्टम और भावनात्मक संघर्ष के बीच हर दिन जीने की कोशिश कर रहे हैं।

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