जगदलपुर – केंद्र सरकार द्वारा घोषित पद्मश्री पुरस्कारों में इस वर्ष छत्तीसगढ़ के बस्तर अंचल ने देशभर का ध्यान अपनी ओर खींचा है। दशकों से समाजसेवा और चिकित्सा के क्षेत्र में निस्वार्थ भाव से कार्य कर रहे बस्तर से जुड़े तीन समर्पित व्यक्तित्वों को पद्मश्री सम्मान से अलंकृत किया गया है। यह सम्मान न केवल इन विभूतियों की साधना को मान्यता देता है, बल्कि बस्तर की संघर्षशील धरती की सेवा-संस्कृति को राष्ट्रीय पहचान भी प्रदान करता है।
इस ऐतिहासिक उपलब्धि पर मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि बस्तर जैसे दुर्गम और संवेदनशील क्षेत्रों में सेवा का मार्ग आसान नहीं होता। कठिन भौगोलिक परिस्थितियाँ, संसाधनों की कमी और सामाजिक चुनौतियों के बावजूद इन विभूतियों ने यह सिद्ध कर दिया कि सेवा जब संकल्प बन जाए, तो परिस्थितियाँ स्वयं रास्ता दे देती हैं। उन्होंने कहा कि यह सम्मान पूरे छत्तीसगढ़ के लिए गौरव का विषय है।
‘बड़ी दीदी’ बुधरी ताती: सेवा को जीवन की पहचान बनाने वाली साधिका
दक्षिण बस्तर के अबूझमाड़ अंचल की निवासी बुधरी ताती, जिन्हें पूरा क्षेत्र स्नेहपूर्वक ‘बड़ी दीदी’ कहता है, को समाजसेवा के क्षेत्र में पद्मश्री सम्मान प्रदान किया गया है। बीते लगभग चार दशकों से बुधरी ताती ने अपना संपूर्ण जीवन आदिवासी समाज के उत्थान के लिए समर्पित कर दिया है। आदिवासी बच्चियों की शिक्षा, महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने और बुजुर्गों की सेवा उनके कार्य का मूल आधार रहा है।
सिलाई प्रशिक्षण, शिक्षा और सामाजिक जागरूकता के माध्यम से उन्होंने अब तक 500 से अधिक महिलाओं को आत्मनिर्भरता की राह दिखाई है। नक्सल प्रभावित और संसाधनविहीन क्षेत्रों में भी उनका सेवा कार्य कभी बाधित नहीं हुआ। स्थानीय समाज में उनका स्थान किसी रिश्तेदार से कम नहीं—लोग उन्हें सम्मान और अपनत्व से ‘बड़ी दीदी’ कहकर पुकारते हैं।
डॉ. गोडबोले दंपति: जहां सड़क नहीं, वहां भी स्वास्थ्य की उम्मीद
चिकित्सा क्षेत्र में पद्मश्री सम्मान डॉ. रामचंद्र त्र्यंबक गोडबोले और उनकी पत्नी डॉ. सुनीता गोडबोले को संयुक्त रूप से दिया गया है। डॉ. गोडबोले पिछले 37 वर्षों से अधिक समय से बस्तर और अबूझमाड़ जैसे दुर्गम आदिवासी इलाकों में निःशुल्क चिकित्सा सेवा दे रहे हैं। आयुर्वेद चिकित्सक होने के साथ-साथ वे एक संवेदनशील सामाजिक कार्यकर्ता भी हैं।
पत्नी के साथ मिलकर उन्होंने ‘ट्रस्ट फॉर हेल्थ’ के माध्यम से कुपोषण, सामान्य बीमारियों और स्वास्थ्य जागरूकता के खिलाफ निरंतर अभियान चलाया। सैकड़ों ऐसे गांव, जहां आज भी सड़क, बिजली और मोबाइल नेटवर्क जैसी सुविधाएं नहीं हैं, वहां वे कई बार पैदल चलकर या सीमित संसाधनों के सहारे पहुंचे और स्वास्थ्य शिविरों के माध्यम से जीवन की उम्मीद जगाई। उनके इस समर्पित कार्य के लिए उन्हें पहले स्वामी विवेकानंद अवॉर्ड 2026 से भी सम्मानित किया जा चुका है।
बस्तर की पहचान को मिला नया आयाम
बस्तर अंचल से तीन पद्मश्री पुरस्कार मिलना छत्तीसगढ़ के इतिहास में एक गौरवपूर्ण और प्रेरक अध्याय के रूप में देखा जा रहा है। यह उपलब्धि बताती है कि दुर्गम अंचलों में भी सेवा, संवेदना और मानवता की ऐसी मिसालें मौजूद हैं, जो पूरे देश को दिशा दे सकती हैं। मुख्यमंत्री श्री साय ने विश्वास जताया कि इन विभूतियों का जीवन और कार्य आने वाली पीढ़ियों को समाजसेवा और समर्पण की प्रेरणा देता रहेगा।