बस्तर दशहरा: सरगीपाल में कल होगी ऐतिहासिक बेल पूजा, गाजे-बाजे के साथ दंतेश्वरी मंदिर पहुंचेगा युग्म बेल

शिव-शक्ति के प्रतीक जोड़े बेल की होगी विशेष पूजा-अर्चना, सदियों पुरानी परंपरा में दिखेगी बस्तर की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत

जगदलपुर, 17 अक्टूबर 2026। विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा की अनूठी धार्मिक परंपराओं में शामिल ऐतिहासिक बेल पूजा रविवार, 18 अक्टूबर को सरगीपाल में विधि-विधान के साथ संपन्न होगी। सुबह 11 बजे होने वाले इस पारंपरिक अनुष्ठान में प्राचीन बेल वृक्ष पर प्राकृतिक रूप से एक साथ लगे युग्म बेल की पूजा-अर्चना की जाएगी। इसके बाद गाजे-बाजे और पारंपरिक वाद्ययंत्रों के साथ शोभायात्रा निकालकर युग्म बेल को जगदलपुर स्थित मां दंतेश्वरी मंदिर लाया जाएगा।

शिव-पार्वती के प्रतीक माने जाते हैं युग्म बेल

जगदलपुर के समीप स्थित ग्राम सरगीपाल में होने वाली इस पूजा का मुख्य आकर्षण प्राकृतिक रूप से एक साथ लगे बेल के दो फल हैं। बस्तर की लोकमान्यता के अनुसार, इन युग्म बेल को भगवान शिव और मां पार्वती का प्रतीक माना जाता है। पूजा से एक दिन पहले बेल फलों को विधिवत निमंत्रण देकर लाल वस्त्र अर्पित किए जाते हैं। इसके बाद श्रद्धा और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ पूजा की तैयारियां पूरी की जाती हैं।

वैवाहिक उत्सव जैसा होता है माहौल

बेल पूजा के दौरान सरगीपाल गांव में उत्सव जैसा माहौल देखने को मिलता है। ग्रामीण और महिलाएं पारंपरिक गीत गाते हुए एक-दूसरे को हल्दी लगाकर खुशियां मनाते हैं। इस अनुष्ठान में बस्तर राजपरिवार के सदस्य और माटी पुजारी परंपराओं का निर्वहन करते हैं। इस वर्ष भी कमलचंद भंजदेव की उपस्थिति में धार्मिक विधि-विधान संपन्न होंगे।

शोभायात्रा के साथ मां दंतेश्वरी मंदिर पहुंचेगा युग्म बेल

पूजा-अर्चना पूरी होने के बाद युग्म बेल को सावधानीपूर्वक प्राचीन वृक्ष से उतारा जाएगा। इसके बाद पारंपरिक वाद्ययंत्रों और गाजे-बाजे के साथ शोभायात्रा निकालकर इसे जगदलपुर के मां दंतेश्वरी मंदिर लाया जाएगा, जहां विधिपूर्वक स्थापित किया जाएगा। बस्तर दशहरा की यह परंपरा स्थानीय आस्था और सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

राजा के आखेट से जुड़ी है परंपरा की मान्यता

बेल पूजा के पीछे एक प्राचीन लोकमान्यता भी प्रचलित है। कहा जाता है कि सदियों पहले बस्तर के तत्कालीन राजा जब इस वन क्षेत्र में आखेट के लिए आए थे, तब उन्हें यहां देवी शक्ति की उपस्थिति का आभास हुआ और दिव्य स्वप्न प्राप्त हुआ। इसी मान्यता के आधार पर सरगीपाल में बेल पूजा की परंपरा शुरू होने की बात कही जाती है। आज भी यह अनुष्ठान बस्तर दशहरा की विशिष्ट पहचान और क्षेत्र की धार्मिक-सांस्कृतिक परंपराओं को जीवंत बनाए हुए है।

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