बिलासपुर, 9 अक्टूबर 2026। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने सेवानिवृत्त सरकारी कर्मचारियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई को लेकर अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि सेवानिवृत्ति के बाद किसी कर्मचारी के खिलाफ विभागीय जांच या कार्रवाई शुरू करने के लिए छत्तीसगढ़ सिविल सेवा पेंशन नियम, 1976 के तहत राज्यपाल की पूर्व अनुमति अनिवार्य है। केवल मुख्यमंत्री की सहमति के आधार पर ऐसी कार्रवाई नहीं की जा सकती।
यह फैसला न्यायमूर्ति बीडी गुरु की एकल पीठ ने पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के पूर्व मुख्य अभियंता रियाजुल बारी की याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया। अदालत ने कहा कि कोई भी शासकीय परिपत्र या कार्यालयीन निर्देश वैधानिक नियमों की जगह नहीं ले सकता। जब कानून में किसी प्रक्रिया के लिए स्पष्ट प्रावधान निर्धारित हैं, तो शासन को उनका पालन करना अनिवार्य है।
मुख्यमंत्री की मंजूरी को पर्याप्त मानने की दलील खारिज
मामले के अनुसार, रियाजुल बारी ग्रामीण अभियांत्रिकी सेवा में करीब 40 वर्ष तक सेवाएं देने के बाद जून 2023 में मुख्य अभियंता के पद से सेवानिवृत्त हुए थे। सेवानिवृत्ति के समय विभाग ने उन्हें अनापत्ति प्रमाणपत्र जारी किया था। इसके बाद उन्हें संविदा नियुक्ति भी दी गई।
हालांकि, प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के रखरखाव फंड में कथित अनियमितता के मामले में शासन ने अप्रैल 2026 में उन्हें आरोप पत्र जारी कर दिया। इसके खिलाफ रियाजुल बारी ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने दलील दी कि मार्च 2017 के शासकीय परिपत्र के अनुसार ऐसे मामलों में मुख्यमंत्री की मंजूरी पर्याप्त है। सरकार ने यह भी बताया कि इस मामले में फरवरी 2026 में मुख्यमंत्री की सहमति ली गई थी।
आरोप पत्र और विभागीय प्रक्रिया निरस्त
याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मतीन सिद्दीकी ने पक्ष रखते हुए पेंशन नियमों के प्रावधानों का हवाला दिया। अदालत ने राज्य सरकार की दलील स्वीकार नहीं की और वैधानिक नियमों के उल्लंघन के आधार पर पूर्व अधिकारी के खिलाफ जारी आरोप पत्र तथा पूरी विभागीय प्रक्रिया को निरस्त कर दिया।
हालांकि, हाईकोर्ट ने नियमानुसार नई कार्रवाई शुरू करने की स्वतंत्रता भी दी है। इस फैसले को सेवानिवृत्त सरकारी कर्मचारियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई में निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के पालन के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।