बिल्कुल, इसे पूरी तरह नए शब्दों और न्यूज़ स्टाइल में लिख रहा हूं:

रिटायरमेंट के बाद भी बच्चों के बीच ‘गुरुजी’, 300 रुपये से शुरू किया था सफर, अब मुफ्त में बांट रहे शिक्षा

पखांजूर। 5सितंबर 2026/शिक्षक की पहचान सिर्फ नौकरी तक सीमित नहीं होती, इसे पखांजूर के बंशीपद देवनाथ अपने काम से साबित कर रहे हैं। शिक्षा विभाग में करीब 36 साल तक सेवाएं देने के बाद 2022 में सेवानिवृत्त हुए देवनाथ आज भी बच्चों को पढ़ाने में जुटे हैं। खास बात यह है कि वे इसके लिए किसी तरह का मानदेय नहीं लेते और अपनी इच्छा से बच्चों को निःशुल्क पढ़ाते हैं।

बंशीपद देवनाथ ने वर्ष 1985 में मिनी पीपीएससी परीक्षा उत्तीर्ण कर शिक्षक के रूप में करियर शुरू किया था। उनकी पहली नौकरी का वेतन महज 300 रुपये महीना था, लेकिन कम सुविधाओं के बावजूद उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में पूरी निष्ठा से काम किया। लंबे सेवाकाल के दौरान उन्होंने पखांजूर क्षेत्र के कई विद्यालयों में बच्चों को पढ़ाया और प्रधान पाठक की जिम्मेदारी भी संभाली।

30 सितंबर 2022 को पीवी-131 प्राथमिक शाला से सेवानिवृत्त होने के बाद भी उनका बच्चों से रिश्ता खत्म नहीं हुआ। वे लगातार अलग-अलग स्कूलों में पहुंचकर विद्यार्थियों को पढ़ा रहे हैं। उनका मानना है कि शिक्षक का असली पुरस्कार बच्चों को आगे बढ़ते देखना है।

आज के दौर में जब सेवानिवृत्ति के बाद लोग अपने निजी जीवन में व्यस्त हो जाते हैं, बंशीपद देवनाथ ने अपना समय बच्चों के नाम कर दिया है। उनकी यह पहल बताती है कि नौकरी की अवधि खत्म हो सकती है, लेकिन एक सच्चे शिक्षक का ज्ञान और समाज के प्रति समर्पण कभी रिटायर नहीं होता।

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