जगदलपुर 12अगस्त 2026/विश्वप्रसिद्ध बस्तर दशहरा पर्व की पहली महत्वपूर्ण रस्म पाट जात्रा बुधवार को जगदलपुर स्थित मां दंतेश्वरी मंदिर परिसर में पारंपरिक विधि-विधान और उत्साह के साथ संपन्न हुई। हरेली अमावस्या के साथ शुरू हुए इस अनूठे पर्व की पाट जात्रा रस्म के बाद अब आगामी दिनों में बस्तर दशहरा की विभिन्न ऐतिहासिक और पारंपरिक रस्मों का सिलसिला शुरू होगा। करीब 75 दिनों तक चलने वाला यह पर्व बस्तर की लोक आस्था, जनजातीय संस्कृति और सदियों पुरानी परंपराओं का जीवंत स्वरूप माना जाता है।
बिलोरी गांव से लाया गया काष्ठ
पाट जात्रा की परंपरा के तहत बिलोरी गांव से विशेष रूप से पेड़ का एक तना काटकर जगदलपुर लाया गया। मां दंतेश्वरी मंदिर परिसर में पहुंचने के बाद इस काष्ठ की विधि-विधान से पूजा-अर्चना की गई। स्थानीय परंपरा में इस लकड़ी को ‘ठुरलू खोटला’ कहा जाता है। धार्मिक अनुष्ठान के बाद यह काष्ठ बस्तर दशहरा की आगामी तैयारियों का महत्वपूर्ण हिस्सा बनेगा।
बताया जाता है कि इसी लकड़ी से दशहरा पर्व के विशाल रथ के निर्माण में उपयोग किए जाने वाले हथौड़े और अन्य पारंपरिक औजार तैयार किए जाएंगे। इस तरह पाट जात्रा केवल एक धार्मिक रस्म नहीं, बल्कि बस्तर दशहरा की आगे की तैयारियों की शुरुआत का भी महत्वपूर्ण पड़ाव है।
करीब 600 साल पुरानी है परंपरा
बस्तर दशहरा की सबसे बड़ी विशेषता इसकी लंबी अवधि और अनूठी परंपराएं हैं। यह पर्व सामान्य दशहरा आयोजनों से अलग अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान रखता है। करीब 600 वर्षों से चली आ रही परंपरा आज भी बस्तर में उसी श्रद्धा और उत्साह के साथ निभाई जा रही है। पर्व के दौरान एक के बाद एक कई महत्वपूर्ण रस्में आयोजित होती हैं, जिनमें बस्तर की आदिवासी संस्कृति, लोक आस्था और सामुदायिक परंपराओं की झलक देखने को मिलती है।
पर्व की विभिन्न रस्मों में स्थानीय देवी-देवताओं के प्रति आस्था के साथ बस्तर की पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था और जनजातीय संस्कृति की भी महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। यही वजह है कि बस्तर दशहरा देश के अन्य हिस्सों में मनाए जाने वाले दशहरा पर्व से अपनी अलग पहचान रखता है।
देश-विदेश से पहुंचते हैं पर्यटक
बस्तर दशहरा की अनूठी रस्मों और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को देखने के लिए देश के विभिन्न हिस्सों के साथ विदेशों से भी पर्यटक बस्तर पहुंचते हैं। करीब ढाई महीने तक चलने वाले इस पर्व के दौरान जगदलपुर और आसपास के क्षेत्रों में उत्सव का माहौल बना रहता है। अलग-अलग रस्मों के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु और पर्यटक शामिल होते हैं।
प्रशासन की ओर से पर्व की विभिन्न रस्मों को व्यवस्थित ढंग से संपन्न कराने के लिए विशेष तैयारियां की जाती हैं। आयोजन के दौरान परंपराओं की निरंतरता बनाए रखने के साथ श्रद्धालुओं और पर्यटकों की सुविधा का भी ध्यान रखा जाता है।
विश्व धरोहर में शामिल कराने की तैयारी
बस्तर दशहरा की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्ता को देखते हुए इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने की दिशा में भी प्रयास किए जा रहे हैं। पर्यटन विभाग की ओर से इस करीब 75 दिनों तक चलने वाले अनूठे पर्व को विश्व धरोहर की सूची में शामिल कराने के लिए प्रयास किए जा रहे हैं। यदि बस्तर दशहरा को विश्व धरोहर का दर्जा मिलता है तो इससे बस्तर की सांस्कृतिक पहचान को वैश्विक स्तर पर नई मजबूती मिलेगी और क्षेत्र में पर्यटन को भी बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।
अब आगे होंगी कई पारंपरिक रस्में
पाट जात्रा के साथ बस्तर दशहरा का औपचारिक शुभारंभ हो चुका है। अब आने वाले दिनों में पर्व से जुड़ी अन्य महत्वपूर्ण रस्में निर्धारित परंपराओं के अनुसार संपन्न होंगी। विशाल रथ के निर्माण से लेकर विभिन्न धार्मिक और सांस्कृतिक अनुष्ठानों तक पूरा आयोजन बस्तर की सदियों पुरानी विरासत को सामने लाएगा।
इस तरह पाट जात्रा के साथ एक बार फिर बस्तर की धरती पर आस्था, संस्कृति और परंपरा का अनूठा पर्व शुरू हो गया है। आने वाले करीब 75 दिनों तक बस्तर दशहरा न केवल स्थानीय लोगों के लिए श्रद्धा और उत्सव का केंद्र रहेगा, बल्कि देश-दुनिया के पर्यटकों के लिए भी बस्तर की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को करीब से जानने का अवसर बनेगा।