साइकिल बनी सहारा: संघर्ष से सम्मान तक पहुंची विभूति पटनायक की कहानी

जगदलपुर। सीमित संसाधनों के बावजूद मजबूत इरादे इंसान की जिंदगी बदल सकते हैं। जगदलपुर जनपद क्षेत्र के बाबू सेमरा गांव के 59 वर्षीय विभूति पटनायक ने इसका जीवंत उदाहरण पेश किया है। कभी मजदूरी के लिए दूसरे राज्य जाने को मजबूर रहने वाले विभूति आज अपने गांव में ही स्वच्छता से जुड़ा काम कर सम्मानजनक आय अर्जित कर रहे हैं।
परिवार छोटा होने के बावजूद जिम्मेदारियां बड़ी थीं। गांव में नियमित काम नहीं मिलने से उन्हें बेंगलुरु जाना पड़ा, जहां एक निजी प्लांट में नौकरी मिली। कुछ समय तक स्थिति संभली, लेकिन बीमारी, दवाइयों का खर्च और परिवार से दूरी ने उन्हें फिर संकट में डाल दिया। इसी बीच गांव में स्थापित कचरा संग्रहण केंद्र की जानकारी ने उनकी जिंदगी की दिशा बदल दी।
बुरुंदवाड़ा क्षेत्र में स्थापित मटेरियल रिकवरी फैसिलिटी (एमआरएफ) केंद्र, जो जिला पंचायत के सहयोग से Centre for Environment Education, HDFC Bank और Srishti Waste Management के संयुक्त प्रयास से संचालित हो रहा है, वहां सूखे कचरे की खरीदी की जाती है। यह जानकारी मिलते ही विभूति ने अपनी साइकिल को ही रोज़गार का साधन बना लिया।
अब वे आसपास के गांवों, ढाबों और होटलों से प्लास्टिक बोतलें, कांच, कागज और गत्ता इकट्ठा कर साइकिल से केंद्र तक पहुंचाते हैं। इस काम से उन्हें रोज़ाना 500 से 600 रुपये तक की आय होने लगी है। सबसे बड़ी बात यह कि अब उन्हें अपने गांव छोड़कर बाहर नहीं जाना पड़ता।
उनका यह प्रयास केवल कमाई तक सीमित नहीं है, बल्कि गांव में स्वच्छता और पर्यावरण संरक्षण में भी योगदान दे रहा है। बिना ईंधन, बिना प्रदूषण और कम लागत में बेहतर आय का यह मॉडल ग्रामीण क्षेत्र में आजीविका का नया रास्ता दिखा रहा है।
विभूति पटनायक की कहानी बताती है कि अवसर अगर स्थानीय स्तर पर मिल जाएं और व्यक्ति में हिम्मत हो, तो साधारण साधन भी असाधारण बदलाव ला सकते हैं। आज वे अपने परिवार के सहारा होने के साथ-साथ गांव में स्वच्छता जागरूकता के प्रेरणास्रोत भी बन चुके हैं।

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