22 पीढ़ियों से नेताम परिवार निभा रहा बेल के कांटों का झूला तैयार करने की परंपरा, काछनगादी के साथ शुरू होगा दशहरा के पारंपरिक आयोजनों का सिलसिला
जगदलपुर, 9 अक्टूबर 2026। विश्वप्रसिद्ध बस्तर दशहरा के निर्विघ्न आयोजन की अनुमति लेने वाली सदियों पुरानी परंपरा काछनगादी की तैयारियां पूरी हो गई हैं। शनिवार को काछन गुड़ी में आयोजित होने वाली इस विशेष रस्म में बस्तर राज परिवार के सदस्य एवं माटी पुजारी कमलचंद भंजदेव पारंपरिक विधि-विधान के साथ रण की देवी काछन से बस्तर दशहरा के सफल आयोजन की अनुमति मांगेंगे। इस अनुष्ठान का प्रमुख आकर्षण बेल के कांटों से बना विशेष झूला होगा, जिस पर देवी काछन का स्वरूप धारण करने वाली 11 वर्षीय बालिका पीहू दास सवार होंगी।
22 पीढ़ियों से झूला बनाने की जिम्मेदारी निभा रहा नेताम परिवार
काछनगादी में इस्तेमाल होने वाला बेल के कांटों का झूला तैयार करने की जिम्मेदारी लामनी स्कूलपारा निवासी जगत राम नेताम के परिवार के पास है। परिवार के सदस्य जयराम नेताम के अनुसार, उनका परिवार पिछले 22 पीढ़ियों से पूरी निष्ठा और श्रद्धा के साथ इस परंपरा का निर्वहन करता आ रहा है। परंपरा के अनुसार, तैयार झूले को शनिवार को काछन गुड़ी पहुंचाया जाएगा।
पांचवीं कक्षा की छात्रा पीहू पर सवार होंगी देवी काछन
इस वर्ष बैलाबाजार पारा निवासी लगभग 11 वर्षीय पीहू दास देवी काछन के स्वरूप में अनुष्ठान का हिस्सा बनेंगी। विद्या ज्योति स्कूल में पांचवीं कक्षा में पढ़ने वाली पीहू बेल के कांटों से बने झूले पर सवार होंगी। वहीं, विधान के अंतर्गत देवी काछन की बहन रैला देवी के स्वरूप में बालिका गुनगुन की भी विधिवत पूजा-अर्चना की जाएगी।
काछनगादी के साथ होगा बस्तर दशहरा के पारंपरिक कार्यक्रमों का आगाज
बस्तर की सांस्कृतिक पहचान से जुड़ी काछनगादी की रस्म पूरी होने के बाद दशहरा के पारंपरिक कार्यक्रमों का विधिवत आगाज होगा। इस अनूठी परंपरा को देखने और देवी का आशीर्वाद लेने के लिए बस्तर अंचल के विभिन्न क्षेत्रों से बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के काछन गुड़ी पहुंचने की उम्मीद है। सदियों से चली आ रही यह परंपरा बस्तर की विशिष्ट सांस्कृतिक विरासत और पीढ़ियों से चली आ रही आस्था का प्रतीक है।