जगदलपुर, 12 अक्टूबर 2026। विश्वप्रसिद्ध बस्तर दशहरा की विशिष्ट परंपराओं में शामिल जोगी बिठाई की रस्म आज सोमवार शाम विधि-विधान के साथ निभाई जाएगी। इस दौरान ग्राम बड़े आमाबाल के हल्बा समुदाय के युवक दौलत लगातार तीसरी बार नौ दिनों की कठिन तपस्या और साधना पर बैठेंगे। करीब 600 वर्षों से चली आ रही इस परंपरा में बस्तर अंचल की सुख-समृद्धि और दशहरा पर्व के निर्विघ्न संपन्न होने की कामना की जाती है।
मावली मंदिर में पूजा के बाद सिरहासार भवन पहुंचेंगे जोगी
जोगी बिठाई की रस्म की शुरुआत सोमवार शाम मावली मंदिर में पुजारी द्वारा दीप प्रज्ज्वलन से होगी। इसके बाद देवी की पूजा-अर्चना और मंदिर में स्थापित पवित्र तलवार का विधिवत पूजन किया जाएगा। धार्मिक अनुष्ठान पूरा होने के बाद जोगी पवित्र तलवार धारण कर मुंडाबाजा और पारंपरिक वाद्ययंत्रों की मंगल धुनों के बीच सिरहासार भवन पहुंचेंगे।
यहां प्रार्थना के बाद जोगी भवन परिसर में तैयार करीब चार फीट गहरे गड्ढे में पालथी लगाकर आसन ग्रहण करेंगे। इसके साथ ही वे आगामी नौ दिनों तक कठिन तपस्या और निराहार व्रत का संकल्प लेंगे।
राजा से हल्बा समाज को मिली परंपरा की जिम्मेदारी
बस्तर दशहरा की इस प्राचीन रस्म का ऐतिहासिक महत्व भी है। रियासतकाल में जोगी बिठाई की परंपरा का निर्वहन स्वयं बस्तर के राजा किया करते थे। बाद में यह दायित्व हल्बा समाज को सौंप दिया गया। तब से हल्बा परिवार की पीढ़ियां इस धार्मिक जिम्मेदारी को श्रद्धा और निष्ठा के साथ निभाती आ रही हैं।
पाठजात्रा, डेरी गड़ाई और काछनगादी जैसी महत्वपूर्ण रस्मों के बाद होने वाले इस अनुष्ठान में दशहरा समिति के सदस्य, मांझी-चालकी, पुजारी और जोगी परिवार के लोग शामिल होंगे। जोगी की नौ दिवसीय साधना के साथ बस्तर दशहरा की धार्मिक परंपराओं का एक और महत्वपूर्ण चरण आगे बढ़ेगा।