44 साल पुराने 20 लाख रुपये के कथित घोटाले में पूर्व निदेशकों को राहत, हाईकोर्ट ने खारिज की CBI की अपील

बिलासपुर, 19 अक्टूबर 2026। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एनटीपीसी कोरबा से जुड़े करीब 20 लाख रुपये के कथित घोटाले के मामले में अटलांटिक इंजीनियरिंग सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड के दो पूर्व निदेशकों को राहत दी है। जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की एकलपीठ ने एसएस संधू और डीएस संधू को बरी किए जाने के फैसले के खिलाफ केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) की अपील खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ आपराधिक साजिश और धोखाधड़ी के आरोपों को संदेह से परे साबित नहीं कर सका।

1981-82 के मामले में लगे थे 20 लाख रुपये के गबन के आरोप

यह मामला वर्ष 1981-82 का है। अभियोजन के मुताबिक, अटलांटिक इंजीनियरिंग सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड को एनटीपीसी के कोरबा सुपर थर्मल पावर प्रोजेक्ट के तीसरे चरण में वेंटिलेशन सिस्टम और एयर कंडीशनिंग संयंत्र की आपूर्ति एवं स्थापना का ठेका मिला था।

आरोप लगाया गया था कि जनवरी से नवंबर 1982 के बीच कंपनी के निदेशकों और एनटीपीसी के कुछ अधिकारियों ने कथित मिलीभगत से बिना सामान की आपूर्ति किए करीब 20 लाख रुपये का भुगतान करा लिया। इस दौरान फर्जी बिल और वाउचर के इस्तेमाल का भी आरोप था।

1986 में दर्ज हुई थी एफआईआर

सीबीआई ने वर्ष 1986 में मामले में एफआईआर दर्ज कर जांच के बाद आरोप पत्र पेश किया था। विशेष न्यायिक मजिस्ट्रेट, सीबीआई, रायपुर ने 10 जनवरी 2018 को आरोपियों को भारतीय दंड संहिता की धारा 420 (धोखाधड़ी) और 120-बी (आपराधिक साजिश) के तहत दोषी ठहराया था।

इसके बाद आरोपियों ने फैसले को चुनौती दी। विशेष न्यायाधीश, सीबीआई मामलों की विशेष अदालत, रायपुर ने 13 सितंबर 2019 को दोषसिद्धि का फैसला पलटते हुए उन्हें बरी कर दिया। इस फैसले के खिलाफ सीबीआई ने हाईकोर्ट में अपील दायर की थी। सुनवाई के दौरान तीन अन्य आरोपियों की मृत्यु हो गई।

बचाव पक्ष ने क्या दलील दी?

बचाव पक्ष ने अदालत में कहा कि एनटीपीसी अधिकारियों के साथ बैठक के बाद भुगतान संबंधी विसंगतियों का समाधान कर लिया गया था। कथित अतिरिक्त भुगतान की राशि वापस किए जाने और बाद में संबंधित सामान की आपूर्ति किए जाने की दलील भी दी गई।

आरोपियों ने फर्जी बिल जारी करने और धोखाधड़ी के आरोपों से इनकार किया। उनका कहना था कि सामान की आपूर्ति से पहले और गंतव्य पर पहुंचने के बाद एनटीपीसी के अधिकारी उसका सत्यापन करते थे।

आपराधिक साजिश साबित नहीं कर सकी सीबीआई

हाईकोर्ट ने कहा कि आपराधिक साजिश साबित करने के लिए आरोपियों के बीच गैरकानूनी काम करने के समझौते का विश्वसनीय साक्ष्य होना जरूरी है। मामले में अभियोजन पक्ष ऐसा प्रत्यक्ष या परिस्थितिजन्य साक्ष्य पेश नहीं कर सका, जिससे आरोपियों के बीच साजिश साबित हो सके।

अदालत ने यह भी गौर किया कि लेन-देन में कथित रूप से महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले एनटीपीसी के अधिकारियों को आरोपी नहीं बनाया गया था। पर्याप्त साक्ष्यों के अभाव में हाईकोर्ट ने सीबीआई की अपील खारिज कर दी और दोनों पूर्व निदेशकों को बरी किए जाने के फैसले को बरकरार रखा।

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