618 साल पुरानी परंपरा में दिखी बस्तर की आस्था, 12 साल की पीहू पर सवार हुईं काछनदेवी; कांटों के झूले पर झूलकर दी दशहरा मनाने की अनुमति

जगदलपुर, 11 अक्टूबर 2026। बस्तर की अनूठी संस्कृति और सदियों पुरानी परंपराओं के प्रतीक ऐतिहासिक बस्तर दशहरा की शुरुआत काछनगादी की रस्म के साथ हो गई है। शनिवार रात जगदलपुर के भंगाराम चौक स्थित काछनगुड़ी में यह पारंपरिक अनुष्ठान संपन्न हुआ। इस दौरान पनका समाज की 12 वर्षीय पीहू दास पर काछनदेवी सवार हुईं। बेल के कांटों से बने विशेष झूले पर झूलकर देवी ने बस्तर दशहरा मनाने की अनुमति दी। करीब 618 साल पुरानी मानी जाने वाली यह परंपरा आज भी बस्तर की सांस्कृतिक पहचान और जनआस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा बनी हुई है।

नौ दिनों की पूजा और उपवास के बाद निभाई रस्म

काछनगादी की रस्म निभाने वाली पीहू दास पांचवीं कक्षा की छात्रा हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, उन्होंने अनुष्ठान से पहले करीब नौ दिनों तक देवी की पूजा-अर्चना की और उपवास रखा। पीहू पांचवीं बार इस परंपरा में शामिल हुईं। बस्तर दशहरा में काछनगादी की रस्म पनका समाज की कन्या द्वारा निभाई जाती है। यह जिम्मेदारी पीढ़ियों से चली आ रही है और आज भी समाज के लोग इस परंपरा को पूरी श्रद्धा के साथ आगे बढ़ा रहे हैं।

देवी की अनुमति के बाद आगे बढ़ता है दशहरा का विधान

काछनगादी की रस्म में बस्तर राजपरिवार के सदस्य कमलचंद्र भंजदेव भी उपस्थित रहे। उन्होंने माटी पुजारी के रूप में काछनदेवी से दशहरा उत्सव निर्विघ्न संपन्न होने की कामना की। स्थानीय मान्यता के अनुसार, काछनदेवी की अनुमति के बिना बस्तर दशहरा का आयोजन शुरू नहीं किया जाता। देवी से अनुमति मिलने के बाद आतिशबाजी की गई और उत्सव की आगामी धार्मिक रस्मों का मार्ग प्रशस्त हुआ।

22 पीढ़ियों से एक परिवार बना रहा कांटों का झूला

काछनगादी की रस्म में इस्तेमाल होने वाला बेल के कांटों से बना झूला भी इस परंपरा की खास पहचान है। जगदलपुर के लामनी निवासी जगत राम नेताम का परिवार करीब 22 पीढ़ियों से झूला तैयार करने की जिम्मेदारी निभाता आ रहा है। परिवार के सदस्य जंगल से बेल की कांटेदार डालियां लाकर विशेष झूला बनाते हैं। धार्मिक मान्यता और पारिवारिक परंपरा से जुड़ी इस जिम्मेदारी को आज भी उसी समर्पण के साथ निभाया जा रहा है। अनुष्ठान के दौरान परिवार के घर में नौ दिनों तक अखंड दीपक भी प्रज्वलित रखा जाता है।

काछनगादी के बाद रैला देवी की पूजा

बस्तर दशहरा की परंपराओं में रैला देवी की पूजा का भी विशेष महत्व है। काछनगादी की रस्म पूरी होने के बाद जगदलपुर के गोल बाजार में रैला देवी की पूजा की गई। इस पारंपरिक आयोजन को देखने के लिए बस्तर संभाग के अलावा अन्य राज्यों से भी लोग पहुंचे। बस्तर दशहरा की विशेषता यह है कि इसके विभिन्न अनुष्ठानों में अलग-अलग समाजों, गांवों और परिवारों की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है।

12 अक्टूबर को होगी जोगी बिठाई

काछनदेवी से अनुमति मिलने के बाद बस्तर दशहरा के आगामी धार्मिक कार्यक्रम शुरू हो रहे हैं। रविवार को कलश स्थापना का विधान है, जबकि सोमवार, 12 अक्टूबर को जोगी बिठाई की रस्म निभाई जाएगी। इसके बाद पर्व के अन्य पारंपरिक अनुष्ठान भी क्रमशः संपन्न होंगे।

बस्तर दशहरा की खासियत इसकी विशिष्ट परंपराएं हैं, जिनमें आस्था के साथ विभिन्न समुदायों की भागीदारी और पीढ़ियों से निभाई जा रही जिम्मेदारियां देखने को मिलती हैं। काछनगादी की रस्म इसी सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है, जो बस्तर की पहचान को विशिष्ट बनाती है।

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